सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 235
  • २।१४ § २८८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२३
    कायवत् । पृथिवीकायोऽस्यास्तीति पृथिवीकायिकः । तत्कायसंबन्धवशीकृत आत्मा । समवाप्त-
    पृथिवीकायनामकर्मोदयः कार्मणकाययोगस्थो यो न तावत्पृथिवीं कायत्वेन गृह्णाति स पृथिवीजीवः।१
    एवमबादिष्वपि योज्यम् । एते पञ्चविधाः प्राणिनः स्थावराः । कति पुनरेषां प्राणाः । चत्वारः
    स्पर्शेनेन्द्रियप्राणः कायबलप्राणः उच्छ्वासनिश्वासप्राणः आयुःप्राणश्चेति ।
    § २८७. अथ त्रसाः के ते, इत्यत्रोच्यते--
    द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥
    § २८८. द्वे इन्द्रिये यस्य सोऽयं द्वीन्द्रियः । द्वीन्द्रिय आदिर्येषां ते द्वीन्द्रियादयः२ । 'आदि'-
    शब्दो व्यवस्थावाची । क्व व्यवस्थिताः । आगमे । कथम् । द्वीन्द्रियस्त्रीन्द्रियश्चतुरिन्द्रियः पञ्चेन्द्रिय-
    श्चेति । 'तद्गुणसंविज्ञानवृत्तिग्रहणाद् द्वीन्द्रियस्याप्यन्तर्भावः । कति पुनरेषां प्राणाः । द्वीन्द्रियस्य
    तावत् षट् प्राणाः, पूर्वोक्ता एव रसनवाक्प्राणाधिकाः । त्रीन्द्रियस्य सप्त त एव घ्राणप्राणाधिकाः ।
    चतुरिन्द्रियस्याष्टौ त एव चक्षुःप्राणाधिकाः । पञ्चेन्द्रियस्य तिर्यञ्चोऽसंज्ञिनो नव त एव श्रोत्र-
    प्राणाधिकाः । संज्ञिनो दश त एव मनोबलै३प्राणाधिकाः ।
    आदिकका शरीर । जिस जीवके पृथिवीरूप काय विद्यमान है उसे पृथिवीकायिक कहते हैं । तात्पर्य
    यह है कि यह जीव पृथिवीरूप शरीरके सम्बन्धसे युक्त है । कार्मणकाययोगमें स्थित जिस जीवने
    जबतक पृथिवीको कायरूपसे ग्रहण नहीं किया है तबतक वह पृथिवीजीव कहलाता है इसी प्रकार
    जलादिकमें भी चार-चार भेद कर लेने चाहिए । ये पाँचों प्रकारके प्राणी स्थावर हैं । शंका-
    इनके कितने प्राण होते हैं ? समाधान-इनके चार प्राण होते हैं-स्पर्शन इन्द्रियप्राण, कायबल-
    प्राण, उच्छ्वास निःश्वासप्राण और आयुःप्राण ।
    § २८७. अब त्रस कौन हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
    दो इन्द्रिय आदि त्रस हैं ॥ १४ ॥
    § २८८. जिन जीवोंके दो इन्द्रियां होती हैं उन्हें दो इन्द्रिय कहते हैं । तथा जिनके
    प्रारम्भमें दो इन्द्रिय जीव हैं वे दो इन्द्रियादिक कहलाते हैं । यहाँ आदि शब्द व्यवस्थावाची
    है । शंका-ये व्यवस्थित जीव कहाँ बतलाये हैं ? समाधान-आगममें बतलाये हैं । शंका-
    किस क्रमसे ? समाधान-दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इस क्रमसे
    व्यवस्थित हैं । यहाँ तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासका ग्रहण किया है इसलिए द्वीन्द्रियका
    भी अन्तर्भाव हो जाता है । शंका-इन द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके कितने प्राण होते हैं ?
    समाधान-पूर्वोक्त चार प्राणोंमें रसनाप्राण और वचनप्राण इन दो प्राणोंके मिला देनेपर दो
    इन्द्रिय जीवोंके छह प्राण होते हैं । इनमें घ्राणप्राणके मिला देनेपर तीनइन्द्रिय जीवके
    सात प्राण होते हैं । इनमें चक्षुप्राणके मिला देनेपर चौइन्द्रिय जीवके आठ प्राण होते हैं ।
    इनमें श्रोत्रप्राणके मिला देनेपर तिर्यंच असंज्ञीके नौ प्राण होते हैं । इनमें मनोबलके मिला
    देनेपर संज्ञी जीवोंके दस प्राण होते हैं ।
    विशेषार्थ-यहाँ द्वीन्द्रियके छह, त्रीन्द्रियके सात, चतुरिन्द्रियके आठ, असंज्ञीके
    नौ और संज्ञीके दस प्राण पर्याप्त अवस्थाकी अपेक्षा बतलाये हैं । अपर्याप्त अवस्था में इनके
    क्रमसे चार, पाँच, छह और सात प्राण होते हैं । खुलासा इस प्रकार है-कुल
    प्राण दस हैं-पाँच इन्द्रिय प्राण, तीन बल प्राण, आयु और श्वासोच्छ्वास । इनमें-से संज्ञी
    और असंज्ञीके अपर्याप्त अवस्था में श्वासोच्छ्वास, मनोबल और वचनबल ये तीन प्राण नहीं
    १. जीवः । उक्तं च-पुढवी पुढवीकायो पुढवीकाइय पुढविजीवो य । साहारणोपमुक्को सरीरगहिदो
    भवंतरिदो ॥ एव -मु० । २. 'बहुव्रीहौ तद्गुणसंविज्ञानमपि-परि०-शे० प० ४।४ । ३. बलाधिकाः,
    आ०, दि० १, दि० २।