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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 558 में से

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पृष्ठ 236

१२४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१५ § २८९ -
§ २८९. 'आदि'शब्देन निर्दिष्टानामनिर्ज्ञातसंख्यानामियत्तावधारणं कर्त्तव्यमित्यत आह-
पञ्चेन्द्रियाणि ॥१५॥
§ २९०. 'इन्द्रिय'शब्दो व्याख्यातार्थः । 'पञ्च'ग्रहणमवधारणार्थम्, पञ्चैव नाधिक-
संख्यानीति । कर्मेन्द्रियाणां १वागादीनामिह ग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम्; उपयोगप्रकरणात् ।
उपयोगसाधनानामिह ग्रहणं२ न क्रियासाधनानाम्; अनवस्थानाच्च । क्रियासाधनानामङ्गोपाङ्ग-
नामकर्मनिर्वर्तितानां सर्वेषामपि क्रियासाधनत्वमस्तीति न पञ्चैव कर्मेन्द्रियाणि ।
§ २९१. तेषामन्तर्भेदप्रदर्शनार्थमाह-
द्विविधानि३ ॥ १६ ॥
§ २९२. 'विध'शब्दः प्रकारवाची । द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि, द्विप्रकाराणीत्यर्थः ।
कौ पुनस्तौ द्वौ प्रकारौ । द्रव्येन्द्रियं भावेन्द्रियमिति ।
§ २९३. तत्र द्रव्येन्द्रियस्वरूपप्रतिपत्त्यर्थमाह -
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥
होते, शेष सात प्राण होते हैं। चतुरिन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में तीन ये और श्रोत्रेन्द्रिय ये
चार प्राण नहीं होते, शेष छह प्राण होते हैं। त्रीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में चार ये और
चक्षुरिन्द्रिय ये पाँच प्राण नहीं होते, शेष पाँच प्राण होते हैं और द्वीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में
पाँच ये और घ्राणेन्द्रिय ये छह प्राण नहीं होते, शेष चार प्राण होते हैं।
§ २८९. पूर्व सूत्रमें जो आदि शब्द दिया है उससे संख्या नहीं ज्ञात होती अतः उसके
परिमाणका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
इन्द्रियाँ पाँच हैं ॥ १५ ॥
§ २९०. इन्द्रिय शब्दका व्याख्यान कर आये । सूत्रमें जो 'पंच' पदका ग्रहण किया है वह
मर्यादाके निश्चित करनेके लिए किया है कि इन्द्रियाँ पाँच ही होती हैं । इन्द्रियोंकी इससे और
अधिक संख्या नहीं पायी जाती । शंका--इस सूत्रमें वचनादिक कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण करना
चाहिए ? समाधान--नहीं करना चाहिए, क्योंकि उपयोगका प्रकरण है। इस सूत्रमें उपयोगकी
साधनभूत इन्द्रियोंका ग्रहण किया है, क्रियाकी साधनभूत इन्द्रियोंका नहीं। दूसरे क्रियाकी साधन-
भूत इन्द्रियोंकी मर्यादा नहीं है। अंगोपांग नामकर्मके उदयसे जितने भी अंगोपांगोंकी रचना
होती है वे सब क्रियाके साधन हैं इसलिए कर्मेन्द्रियाँ पाँच ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं किया जा
सकता है।
§ २९१. अब उन पाँचों इन्द्रियोंके अन्तर्भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
वे प्रत्येक दो-दो प्रकार की हैं ॥१६॥
§ २९२. विध शब्द प्रकारवाची है । 'द्विविधानि' पदमें 'द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि'
इस प्रकार बहुव्रीहि समास है । जिसका यह आशय है कि ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्येक दो प्रकारकी हैं ।
शंका-वे दो प्रकार कौन हैं ? समाधान-द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय ।
§ २९३. अब द्रव्येन्द्रियके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
निर्वृत्ति और उपकरणरूप द्रव्येन्द्रिय है ॥१७॥
१. 'वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः । - सां० कौ० श्लो० २६ । २. ग्रहणं कृतं न क्रिया-मु०,
ता०, ना० । ३. 'कतिविहाणं भंते इंदिया पण्णत्ता । गोयमा, दुविहा पण्णत्ता । तं जहा-दव्विंदिया य भाविं-
दिया य - पण्णवणा पद १५ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri