सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२७ § ३१३ -
§ ३१३. पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहो व्याघातः कौटिल्यमित्यर्थः । स यस्यां न विद्यतेऽसावविग्रहा गतिः ।
कस्य । जीवस्य । कीदृशस्य । मुक्तस्य । कथं गम्यते मुक्तस्येति । उत्तरसूत्रे संसारिग्रहणादिह
५ मुक्तस्येति विज्ञायते । ननु च 'अनुश्रेणि गतिः' इत्यनेनैव श्रेण्यन्तरसंक्रमाभावो व्याख्यातः ।
नार्थोऽनेन । पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिदं वचनम् । ननु तत्रैव देशकाल-
नियम उक्तः । न; अतस्तत्सिद्धेः ।
§ ३१५. यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिबन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला¹ प्रतिज्ञायते, सदेहस्य
पुनर्गतिः किं प्रतिबन्धिनी उत मुक्तात्मवदित्यत आह -
१० विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्भ्यः ॥२८॥
§ ३१६. कालावधारणार्थं 'प्राक्चतुर्भ्यः' इत्युच्यते । 'प्राग्' इति वचनं मर्यादार्थम्, चतुर्था-
त्समयाद्विग्रहवती गतिर्भवति न चतुर्थ इति । कुत इति चेत् । सर्वोत्कृष्टविग्रहनिमित्तनिष्कुट-
क्षेत्रे उत्प्सुः प्राणी निष्कुटक्षेत्रानुपूर्व्यनुश्रेण्यभावादिषु गत्यभावे निष्कुटक्षेत्रप्रापणनिमित्तां त्रिवि-
जाता है तब उस अवस्थामें गति अनुश्रेणि ही होती है । इसी प्रकार पुद्गलोंकी जो लोकके अन्त-
१५ को प्राप्त करानेवाली गति होती है वह अनुश्रेणि ही होती है । हां, इसके अतिरिक्त जो गति होती
है वह अनुश्रेणि भी होती है और विश्रेणि भी । किसी एक प्रकारकी होनेका कोई नियम नहीं है ।
§ ३१३. अब फिर भी गति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
मुक्त जीवकी गति विग्रहरहित होती है ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहका अर्थ व्याघात या कुटिलता है । जिस गतिमें विग्रह अर्थात् कुटिलता
२० नहीं होती वह विग्रहरहित गति है । शंका- यह किसके होती है ? समाधान - जीवके । शंका--,
किस प्रकारके जीवके ? समाधान - मुक्त जीवके । शंका- यह किस प्रमाणसे जाना जाता है कि
मुक्तजीवके विग्रहरहित गति होती है ? समाधान-अगले सूत्रमें संसारी पदका ग्रहण किया है
इससे ज्ञात होता है कि इस सूत्रमें मुक्त जीवके विग्रहरहित गति ली गयी है । शंका-'अनुश्रेणि
गतिः' इस सूत्रसे ही यह ज्ञात हो जाता है कि एक श्रेणिसे दूसरी श्रेणिमें संक्रमण नहीं होता फिर
२५ इस सूत्रके लिखनेसे क्या प्रयोजन है ? समाधान - पूर्व सूत्रमें कहींपर विश्रेणिगति भी होती है
इस बातका ज्ञान करानेके लिए यह सूत्र रचा है । शंका- पूर्वसूत्रकी टीकामें ही देशनियम और
कालनियम कहा है ? समाधान-नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि इस सूत्रसे होती है ।
§ ३१५. मुक्तात्माकी लोकपर्यन्त गति बिना प्रतिबन्धके नियत समयके भीतर होती है
यदि ऐसा आपका निश्चय है तो अब यह बतलाइए कि सदेह आत्माकी गति क्या प्रतिबन्धके
३० साथ होती है या मुक्तात्माके समान बिना प्रतिबन्धके होती है, इसी बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं -
संसारी जीवकी गति विग्रहरहित और विग्रहवाली होती है । उसमें विग्रहवाली गति चार
समयसे पहले अर्थात् तीन समय तक होती है ॥२८॥
§ ३१६. कालका अवधारण करनेके लिए 'प्राक्चतुर्भ्यः' पद दिया है । 'प्राक्' पद मर्यादा
३५ निश्चित करनेके लिए दिया है । चार समयसे पहले मोड़ेवाली गति होती है चौथे समयमें नहीं यह
इसका तात्पर्य है । शंका- मोड़ेवाली गति चार समयसे पूर्व अर्थात् तीन समय तक ही क्यों होती
है चौथे समयमें क्यों नहीं होती ? समाधान - निष्कुट क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले जीवको सबसे अधिक
१. -न्तादवगतकाला मु० ।