सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूतं कार्मणं शरीरं कर्मेत्युच्यते । योगो वाङ्मनसकायवर्गणानिमित्त आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः । कर्मणा
कृतो योगः कर्मयोगो विग्रहगतौ भवतीत्यर्थः । तेन कर्मादानं देशान्तरसंक्रमश्च भवति ।
§ ३११. आह जीवपुद्गलानां गतिमास्कन्दतां देशान्तरसंक्रमः किमाकाशप्रदेशक्रमवृत्त्या
भवति, उताविशेषेणेत्यत आह—
अनुश्रेणि गतिः ॥२६॥
§ ३१२. लोकमध्यादारभ्य ऊर्ध्वमधस्तिर्यक् च आकाशप्रदेशानां क्रमसंनिविष्टानां पङ्क्तिः
श्रेणिः इत्युच्यते । 'अनु'शब्दस्यानुपूर्व्येण वृत्तिः । १श्रेणेरानुपूर्व्येणानुश्रेणीति जीवानां पुद्गलानां
च गतिर्भवतीत्यर्थः । अनधिकृतानां पुद्गलानां कथं ग्रहणमिति चेत् । गतिग्रहणात् । यदि जीवाना-
मेव गतिरिष्टा स्याद् गतिग्रहणमनर्थकम्; अधिकारात्तत्सिद्धेः । उत्तरत्र जीवग्रहणाच्च पुद्गल-
संप्रत्ययः । ननु चन्द्रादीनां ज्योतिष्काणां२ मेरुप्रदक्षिणाकाले विद्याधरादीनां च विश्रेणिगतिरपि
दृश्यते, तत्र किमुच्यते, 'अनुश्रेणि गतिः' इति । कालदेशनियमोऽत्र वेदितव्यः । तत्र कालनियम-
स्तावज्जीवानां मरणकाले भवान्तरसंक्रमे मुक्तानां चोर्ध्वगमनकाले अनुश्रेण्येव गतिः । देश-
नियमोऽपि ऊर्ध्वलोकादधोगतिः, अधोलोकादूर्ध्वगतिः, तिर्यग्लोकादधोगतिरूर्ध्वा वा तत्रानुश्रेण्येव ।
पुद्गलानां च या लोकान्तप्रापिणी सा नियमादनुश्रेण्येव । इतरा गतिर्भजनीया ।
इस विग्रहके साथ होनेवाली गतिका नाम विग्रहगति है । सब शरीरोंकी उत्पत्तिके मूलकारण
कार्मण शरीरको कर्म कहते हैं । तथा वचनवर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणाके निमित्तसे होने-
वाले आत्मप्रदेशोंके हलनचलनको योग कहते हैं । कर्मके निमित्तसे जो योग होता है वह कर्मयोग
है । वह विग्रहगतिमें होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इससे नूतन कर्मका ग्रहण और एक
देशसे दूसरे देशमें गमन होता है ।
§ ३११. गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंका एक देशसे दूसरे देशमें गमन आकाश-
प्रदेशोंकी पंक्तिक्रमसे होता है या इसके बिना होता है, अब इसका खुलासा करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
गति श्रेणीके अनुसार होती है ॥२६॥
§ ३१२. लोकके मध्यसे लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रमसे स्थित आकाशप्रदेशोंकी
पंक्तिको श्रेणी कहते हैं । अनु शब्द 'आनुपूर्वी' अर्थमें समसित है । इसलिए 'अनुश्रेणि' का अर्थ
'श्रेणीकी आनुपूर्वीसे' होता है । इस प्रकारकी गति जीव और पुद्गलोंकी होती है यह इसका भाव
है । शंका—पुद्गलोंका अधिकार न होनेसे यहाँ उनका ग्रहण कैसे हो सकता है ? समाधान—
सूत्रमें गतिपदका ग्रहण किया है इससे सिद्ध हुआ कि अनधिकृत पुद्गल भी यहाँ विवक्षित हैं ।
यदि जीवोंकी गति ही इष्ट होती तो सूत्रमें गति पदके ग्रहण करनेकी आवश्यकता न थी, क्योंकि
गति पदका ग्रहण अधिकारसे सिद्ध है । दूसरे अगले सूत्रमें जीव पदका ग्रहण किया है इसलिए
इस सूत्रमें पुद्गलोंका भी ग्रहण इष्ट है यह ज्ञान होता है । शंका — चन्द्रमा आदि ज्योतिषियोंकी
और मेरुकी प्रदक्षिणा करते समय विद्याधरोंकी विश्रेणी गति देखी जाती है, इसलिए जीव और
पुद्गलोंकी अनुश्रेणि गति होती है यह किसलिए कहा ? समाधान—यहाँ कालनियम और देश-
नियम जानना चाहिए । कालनियम यथा— मरणके समय जब जीव एक भवको छोड़कर दूसरे
भवके लिए गमन करते हैं और मुक्त जीव जब ऊर्ध्व गमन करते हैं तब उनकी गति अनुश्रेणि ही
होती है । देशनियम यथा—जब कोई जीव ऊर्ध्वलोकसे अधोलोकके प्रति या अधोलोकसे ऊर्ध्व-
लोकके प्रति आता जाता है । इसी प्रकार तिर्यग्लोकसे अधोलोकके प्रति या ऊर्ध्वलोकके प्रति
१. –रानुपूर्वेणा-आ० । २. ज्योतिषां आ०, दि० १, दि० २ ।