सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- २।३० § ३२० ] द्वितीयोऽध्यायः १३३
ग्रहां गतिमारभते नोर्ध्वम्; तथाविधोपपादक्षेत्राभावात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः । विग्रहवती
चाविग्रहा¹ चेति ।
§ ३१७. विग्रहवत्या गतेः कालोऽवधृतः । अविग्रहायाः कियान् काल इत्युच्यते—
एकसमयाऽविग्रहा ॥२९॥
§ ३१८. एकः समयो ²यस्याः सा एकसमया । न विद्यते विग्रहो³ यस्याः सा अविग्रहा । ५
गतिमतां हि जीवपुद्गलानांमव्याघातैनैकसमयिकी गतिरालोकान्तादपीति ।
§ ३१९. अनादिकर्मसंबन्धसंततौ मिथ्यादर्शनादिप्रत्ययवशात्कर्माण्यादादानो विग्रहगतावप्या-
हारकः प्रसक्तस्ततो नियमार्थमिदमुच्यते—
एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥
§ ३२०. अधिकारात्समयाभिसंबन्धः । 'वा'शब्दो विकल्पार्थः । विकल्पश्च यथेच्छाति- १०
सर्गः । एकं वा द्वौ वा त्रीन्वा ⁴समयाननाहारको भवतीत्यर्थः । त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां
योग्यपुद्गलग्रहणमाहारः । तदभावादनाहारकः । कर्मादानं हि निरन्तरं कार्मणशरीरसद्भावे ।
उपपादक्षेत्रं प्रति ऋज्ज्व्यां गतौ आहारकः । इतरेषु त्रिषु समयेषु अनाहारकः ॥
मोड़े लेने पड़ते हैं; क्योंकि वहाँ आनुपूर्वीसे अनुश्रेणिका अभाव होनेसे इषुगति नहीं हो पाती ।
अतः यह जीव निष्कुट क्षेत्रको प्राप्त करनेके लिए तीन मोड़ेवाली गतिका आरम्भ करता. है । यहाँ १५
इससे अधिक मोड़ोंकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि इस प्रकारका कोई उपपादक्षेत्र नहीं पाया
जाता, अतः मोड़ेवाली गति तीन समय तक ही होती है, चौथे समयमें नहीं होती । 'च' शब्द
समुच्चयके लिए दिया है । जिससे विग्रहवाली और विग्रहरहित दोनों गतियोंका समुच्चय होता है ।
§ ३१७. विग्रहवाली गतिका काल मालूम पड़ा । अब विग्रहरहित गतिका कितना काल
है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
एक समयवाली गति विग्रहरहित होती है ॥२९॥
§ ३१८. जिस गतिमें एक समय लगता है वह एक समयवाली गति है । जिस गतिमें विग्रह
अर्थात् मोड़ा नहीं लेना पड़ता वह मोड़ारहित गति है । गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंके
व्याघातके अभावमें एक समयवाली गति लोकपर्यन्त भी होती है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
§ ३१९. कर्मबन्धकी परम्परा अनादिकालीन है अतः मिथ्यादर्शन आदि बन्ध कारणोंके २५
वशसे कर्मोंको ग्रहण करनेवाला जीव विग्रहगतिमें भी आहारक प्राप्त होता है, अतः नियम करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक, दो या तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है ॥३०॥
§ ३२०. समयका अधिकार होनेसे यहाँ उसका सम्बन्ध होता है । 'वा' पदका अर्थ विकल्प
है और विकल्प जहाँ तक अभिप्रेत है वहाँ तक लिया जाता है । जीव एक समय तक, दो समय ३०
तक या तीन समय तक अनाहारक होता है यह इस सूत्रका अभिप्राय है । तीन शरीर और छह
पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंके ग्रहण करनेको आहार कहते हैं । जिन जीवोंके इस प्रकारका आहार
नहीं होता वे अनाहारक कहलाते हैं । किन्तु कार्मण शरीरके सद्भावमें कर्मके ग्रहण करनेमें
अन्तर नहीं पड़ता । जब यह जीव उपपादक्षेत्रके प्रति ऋजुगतिमें रहता है तब आहारक होता
है । बाकीके तीन समयोंमें अनाहारक होता है । ३५
१. चाविग्रहवती चेति मु० । २. समयोऽस्याः, एक-आ०, दि० १ । समयोऽस्याः सा एक- दि० २, ता०,
ना० । ३. -ग्रहोऽस्याः अवि-आ०, दि० १, ता०, ना० । ४. 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ।' -पा० २, ३, ५ ।