सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- २१२ § २८४ ] द्वितीयोऽध्यायः १३१
§ २८१. य एते संसारिणस्ते द्विविधाः-
समनस्कामनस्काः ॥११॥
§ २८२. मनो द्विविधम्—द्रव्यमनो भावमनश्चेति । तत्र पुद्गलविपाकिकर्मोदयापेक्षं
द्रव्यमनः । वीर्यान्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षा१ आत्मनो विशुद्धिर्भावमनः । तेन मनसा
सह वर्तन्त इति समनस्काः । न विद्यते मनो येषां त इमे अमनस्काः । एवं मनसो भावाभावाभ्यां ५
संसारिणो द्विविधा विभज्यन्ते । समनस्काश्चामनस्काश्च समनस्कामनस्का इति । अभ्यर्हितत्वात्स-
मनस्कशब्दस्य पूर्वनिपातः । कथमभ्यर्हितत्वम् । गुणदोषविचारकत्वात् ।
§ २८३. पुनरपि संसारिणां भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥
§ २८४. 'संसारि' ग्रहणमनर्थकम्; प्रकृतत्वात् । क्व प्रकृतम् । 'संसारिणो मुक्ताश्च' इति । १०
नानर्थकम् । पूर्वापेक्षार्थम् । ये उक्ताः समनस्का अमनस्कास्ते संसारिण इति । यदि हि पूर्वस्य
विशेषणं न स्यात् समनस्कामनस्कग्रहणं संसारिणो मुक्ताश्चेत्यनेन यथासंख्यमभिसंबद्ध्येत । एवं
च कृत्वा 'संसारि'ग्रहणमादौ क्रियमाणमुपपन्नं भवति । तत्पूर्वापेक्षं सदुत्तरार्थमपि भवति२ । ते
संसारिणो द्विविधाः-त्रसाः स्थावरा इति । त्रसनामकर्मोदयवशीकृतास्त्रसाः३ । स्थावरनामकर्मोदय-
मुक्त हो जाता है । पूर्ण मोक्ष मुक्त अवस्थामें होता है । इसीसे जीवके संसारी और मुक्त ये दो १५
भेद किये गये हैं ।
§ २८१. पहले जो संसारी जीव कह आये हैं वे दो प्रकारके हैं । आगेके सूत्र द्वारा इसी
बातको बतलाते हैं—
मनवाले और मनरहित ऐसे संसारी जीव हैं ॥११॥
§ २८२. मन दो प्रकारका है द्रव्यमन और भावमन । उनमें से द्रव्यमन पुद्गलविपाकी २०
आंगोपांग नामकर्मके उदयसे होता है तथा वीर्यान्तराय और नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमकी
अपेक्षा रखनेवाले आत्माकी विशुद्धिको भावमन कहते हैं । यह मन जिन जीवोंके पाया जाता है
वे समनस्क हैं । और जिनके मन नहीं पाया जाता है वे अमनस्क हैं । इस प्रकार मनके सद्भाव
और असद्भावकी अपेक्षा संसारी जीव दो भागोंमें बँट जाते हैं। 'समनस्कामनस्काः' इसमें समनस्क
और अमनस्क इस प्रकार द्वन्द्व समास है । समनस्क शब्द श्रेष्ठ है अतः उसे सूत्रमें पहले रखा । २५
शंका—श्रेष्ठता किस कारणसे हैं ? समाधान—क्योंकि समनस्क जीव गुण और दोषोंके विचारक
होते हैं । इसलिए समनस्क पद श्रेष्ठ है ।
§ २८३. अब फिरसे भी संसारी जीवोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा संसारी जीव त्रस और स्थावरके भेदसे दो प्रकार हैं ॥१२॥
§ २८४. शंका—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना निरर्थक है क्योंकि वह प्रकरण प्राप्त ३०
है ? प्रतिशंका—इसका प्रकरण कहाँ है ? शंकाकार—'संसारिणो मुक्ताश्च' इस सूत्रसे उसका
प्रकरण है । समाधान—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना अनर्थक नहीं है, क्योंकि पूर्व सूत्रकी
अपेक्षा इस सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि पूर्व सूत्रमें जो समनस्क और
अमनस्क जीव बतलाये हैं वे संसारी हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए इस सूत्रमें 'संसारी' पद दिया
है । यदि 'संसारी' पदको पूर्वका विशेषण न माना जाय तो समनस्क और अमनस्क इनका संसारी ३५
और मुक्त इनके साथ क्रमसे सम्बन्ध हो जायगा । और इस अभिप्रायसे 'संसारी' पदका आदिमें
ग्रहण करना बन जाता है । इस प्रकार 'संसारी' पदका ग्रहण पूर्व सूत्रकी अपेक्षासे होकर अगले
१. -पेक्ष्या आत्मनो मु०, ता० । २. भवति । संसा-मु० । ३. त्रसनाम भा०, दि० १, दि० २, ता० ।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri