संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
६४ सूरदासजी
चतुर सुजान सभा मैं बैठे, दुःसासन अनरीति क ॰ ।
सुमिरन कियो द्रोपदी जबहीँ, खैँचत चीर उबारि ध ॥२
ध्रुव प्रहलाद रैनि दिन ध्यावै, प्रगट भये बैकुंठ पुरी ।
भारत मैं अरुही के अंडा, ता पर गज को घंट ढुरी ॥३॥
अंबरीष गृह आये दुर्बासा, चक्र सुदर्सन छाँहि करी१ ।
सूर के स्वामी गजराज उबारे, कृपा करी जगदीस हरी ॥४॥
(६)
दीनानाथ अब बार तुम्हारी ।
पतित-उधारन विरद२ जानि के, विगरी लेहु सँवारी ॥१॥
बालापन खेलत ही खोयो, जुवा विषय रस माते ।
वृद्ध भये सुधि प्रगटी मो को, दुखित पुकारत ता तैँ ॥२॥
सुतन्ह तज्यो त्रिय भ्रात तज्यो सब, तन तैँ त्वचा भइ न्यारी ।
स्रवन न सुनत चरन गति थाकी, नैन बहे जल धारी ॥३॥
पलित३ केस कफ कण्ठ अब रूंध्यो४, कल न परै दिन राती।
माया मोह न छाड़ै तृस्ना, यह दोऊ दुखदाती ॥ ४ ॥
अब यह व्यथा दूर करिये को, और न समरथ कोई ।
सूरदास प्रभु करुना-सागर, तुम तैँ होय सो होई ॥ ५ ॥
(७)
नाथ मोहिँ अबकी बेर उबारो ॥ टेक ॥
तुम नाथन के नाथ सुवामी, दाता नाम तिहारो ।
करमहीन जनम को अंधो, मो तैँ कौन नकारो ॥ १ ॥
(१) कथा है कि परम भक्त राजा अंबरीष को बिना अपराध दुर्बासा ऋषि
ने शाप देना चाहा जिस पर विष्णु के सुदर्शन चक्र ने दुर्बासा को खदेरा । मुनि
जी भागते २ विष्णु की शरण में पहुँचे पर उन्होंने अपने भक्त के अपराधी की
रक्षा करने मैं अपनी असमर्थ्यता प्रगट की और अंत को राजा अंबरीष के
शरणागत होने पर वह बचे । (२) प्रण । (३) पके । (४) घरघराना ।
शब्द संग्रह ६५
तीन लोक के तुम प्रति-पालक, मैं तो दास तिहारो ।
तारी जाति कुजाति प्रभू जी, मो पर किरपा धारो ॥२॥
पतितन मैं इक नायक कहिये, नीचन मैं सरदारी ।
कोटि पापी इक पासँग मेरे, अजामिल कौन बिचारी ॥३॥
नाठो धरम नाम सुनि मेरो, नरक कियो हठ तारो ।१
मो को ठौर नहीं अब कोऊ, अपनो बिरद सम्हारी ॥४॥
छुद्र पतित तुम तारे रमापति, अब न करो जियगारो ।
सूरदास साचो तब माने, जो ह्वै मम निस्तारो ॥ ५ ॥
(८)
चूक परी मो तैं मैं जानी, मिलैं स्याम बकसाऊँ री ।
हा हा करि दसननि तृन धरिधरि, लोचन जलनि ढराऊँ री२ १
चरन गहौँ गाढ़े करि कर सौँ, पुनि पुनि सीस छुआऊँ री ।
मुख चितऊँ फिरि धरनि निहारौँ, ऐसे रुचि उपजाऊँ री ॥२
मिलैँ धाय अकुलाय भुजनि भरि, उर की तपनि जनाऊँ री ।
सूरस्याम अपराध छमहु अब, यह कहि कहि जु सुनाऊँ री ३
(९)
माधो जू जो जन तैं बिगरै ।
सुन कृपालु करुनामय कबहुँ, प्रभु नहिँ चित्त धरै ॥ १ ॥
ज्यौँ सिसु३ जननि४ जठर५ अंतरगत, सत अपराध करै ।
तऊ तनय६ तनु तोष पोष चित, बिहँसत अंक भरै ॥२॥
जदपि बिटप७ जर हतन८ हेत करि, कर कुठार पकरै ।
तदपि सुभाव सुसील सुसीतल, रिपु तनु ताप हरै ॥३॥
(१) धर्मराय ने मेरा नाम सुनकर मुझे ग्रहण करने से इनकार किया और
नर्क बोला कि हमारे यहाँ रहने के यह योग्य नहीं है-इस को तार कर हटाओ ।
(२) दाँतों के नीचे तिनका धर कर (जोकि निशान आधीनता का है) आँखों से
जल धारा वहाती हूँ । (३) बालक । (४) माता । (५) पेट । (६) बेटा । (७) पेड़ ।
(८) काटने के लिये ।
६
६६ सूरदासजी
कारन करन अनन्त अजित कहँ, केहिँ विधि चरन रै ।
यह कलिकाल चलत नहिं मो पै, सूर सरन उबरै ॥ ॥
(१०)
अब हैँ नाच्यो बहुत गोपाल ॥ टेक ॥
काम क्रोध को पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल ।
महा मोह के नूपुर बाजत, निन्दा सबद रसाल ॥ १ ॥
तृस्ना नाद करत घट भीतर, नाना बिधि की ताल ।
माया को कटि१ फेटा बाँध्यो, लोभ तिलक दियो भाल२॥२
कोटिक कला नाच दिखराई, जल थल सुधि नहिँ काल ।
सूरदास की सभी अबिद्या, दूर करो नँदला॰ ॥ ३ ॥
(११)
मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसा निमक-हरामी ॥१॥
भरि भरि उदर बिषय को धावौँ, जैसे सूकर ग्रामी३ ।
हरि-जन छाड़ हरि-बिमुखन की, निसिदिन करतगुलामी॥२
पापी कौन बड़ो है मो तैं, सब पतितन मैं नामी ।
सूर पतित को ठौर कहाँ है, सुनिये श्रीपति४ स्वामी ॥३॥
॥ उपदेश ॥
(१)
छाडु मन हरि बिमुखन को संग ।
कहा भयो पय पान कराये, विष नहिँ तजत भुवंग ॥१॥
जा के संग कुबुद्धी उपजै, परत भजन मैं भंग ।
काम क्रोध मद लोभ मोह मैँ, निस दिन रहत उमंग ॥२॥
कागहि कहा कपूर खवाये, स्वान न्हवाये गंग ।
खर को कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग ॥ ३ ॥
(१) कमर । (२) सिर । (३) गाँव का सुअर । (४) लक्ष्मी के पति अर्थात विष्णु ।
द्वितीय भाग: सन्त दादू दयाल, सुन्दरदास एवं रज्जब जी के पद
शब्द संग्रह ६७
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीता¹ करत निषंग² ।
सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग ॥ ४ ॥
(२)
सब दिन होत न एक समान ॥ टेक ॥
इक दिन राजा हरीचंद गृह, संपति मेरु समान ।
इक दिन जाय स्वपच गृह सेवत, अंचर हरत मसान ॥१॥
इक दिन दूलह बनत बराती, चहुँ दिसि गड़त निसान ।
इक दिन डेरा होत जँगल मैं, कर सूधे पग तान ॥२ ॥
इक दिन सीता रुदन करत है, महा विषम उद्यान³ ।
इक दिन रामचन्द्र मिलिदोऊ, विचरत पुष्प विमान ॥३॥
इक दिन राजा राज जुधिष्टिर, अनुचर श्रीभगवान ।
इक दिन द्रोपदि नग्न होत है, चीर दुसासन तान ॥४ ॥
प्रगटत है पूरब की करनी, तजु मन सोच अजान ।
सूरदास गुन कहँ लग वरनौँ, विधि के अंक⁴ प्रमान ॥५॥
स्वामी हरिदास
यह एक भारी कृष्ण भक्त हुए जो सोलहवें शतक के पिछले हिस्से से सत्रहवें
शतक के अगले हिस्से तक विराजमान थे। ललिता सखी के अवतार समझे
जाते हैं। गान विद्या मैं यह बड़े निपुन प्रसिद्ध तानसेन के गुरू थे। अकबर
वादशाह जो इन का समकालीन था एक वार तानसेन के साथ इन के दर्शन को
आया था। इन के कई एक ग्रंथ हैं जिन मैं से भरथरी-वैराग्य और रस के पद
प्रसिद्ध हैं। भरथरी-वैराग्य संबत १६०७ मैं और पद १६१७ मैं बनाये गये।
(१)
गायो न गोपाल मन लाइ के निवारि लाज ।
पायो न प्रसाद साधु मण्डली मैं जाइ के ॥ १ ॥
(१) ख़ाली । (२) तरकश । (३) भारी, जंगल मैं । (४) ब्रह्मा का कर्म्म लेख ।
६८ मीरा बाई
धायो न धमक वृन्दाविपिन की कुंजन मैं।
रह्यो न सरन जाइ - विठुलेसराइ के ॥ २ ॥
नाथ जू न देखि छक्यो छिनहूँ छबीली छाँव।
सिंह पौरि पर्यो नाहिं सीसहुँ नवाइ के ॥ ३ ॥
कहै हरिदास तोहिँ लाज हू न आवै नेक।
जनम गँवाये ना कमायो कछु आइ के ॥ ४ ॥
(२)
गहौ मन, सब रस को रस सार ॥ टेक ॥
लोक वेद कुल करमै तजिये, भजिये नित्य विहार ॥१॥
गृह कामिनि कंचन-धन त्यागो, सुमिरौ स्याम उदार ॥२
गहि हरिदास रीति सन्तन को, गादी को अधिकार ॥३॥
मीरा बाई
जीवन समय—१५७३ से १६३० तक। जन्म स्थान—मौ० कुकड़ी (मेरता.
मारवाड़)। जाति और आश्रम—राठोर, गृहस्थ। गुरू—रैदासजी।
इन की अनूठी भक्ति जग-प्रसिद्ध है। यह जोधपुर के राठोर राव रंजीतसिंह
की एकलौती बेटी थीं और उदयपुर के युवराज कुँवर भाजराज से ब्याही गईं
जो राजगद्दी पर बैठने के पहिले ही मर गये। पति के देहान्त होने पर मीरा बाई के
देवर ने जो गद्दी पर बैठे इन को निरंतर भक्ति और साधु सेवा करने के कारन
बहुत सताया यहाँ, तक कि बाई जी को घर से भाग जाना पड़ा। कहते हैं कि
मीरा बाई अंत समय द्वारका में रनछोर जी की मूर्त्ति में समा कर अलोप होगईँ।
॥ चितावनी ॥
(१)
मनखा¹ जनम पदारथ पायो, ऐसो बहुर न आती ॥टेक॥
अब के मोसर² ज्ञान बिचारो, राम राम मुख गाती।
सतगुर मिलिया सुंज³ पिछानी, ऐसा ब्रह्म मैं पाती ॥१॥
(१) मनुष्य का। (२) अवसर। (३) सूझ।
शब्द संग्रह ६६
सगुरा सूरा अमृत पीवे, निगुरा प्यासा जाती।
मगन भया मेरा मन सुख मैं, गौबिंद का गुन गाती ॥२॥
साहिब पाया आदि अनादी, नातर १ भव मैं जाती।
मीरा कहे इक आस आप की, ओराँ २ सँ सकुचाती ॥३॥
(२)
भज मन चरन कँवल अविनासी ॥ टेक ॥
जेताइ दीसै धरनि गगन बिच, तेताइ सब उठि जासी ।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे. कहा लिये करवत कासी ॥१
इस देही का गरब न करना, माटी मैं मिल जासी ।
यो संसार चहर ३ की बाजी, साँझ पद्याँ उठि जासी ॥२॥
कहा भयो है भगवा पहरुयाँ, घर तज भये सन्यासी ।
जोगी होय जुगति नहिं जानी, उलटि जनम फिर आसी ॥३
अरज करैँ अबला कर जोरे, स्याम तुम्हारी दासी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नांगर, काटो जम की फाँसी ॥४॥
॥ विरह ॥
(१)
हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय ॥टेक॥
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय ।
गगन मॅडल पै सेज पिया की, किस बिंध मिलना होय ॥१॥
घायल की गति घायल जानै, की जिन लाई होय ।
जौहरी को गत जौहरी जानै, की जिन जौहर होय ॥२॥
दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्या नहिं कोय ।
मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जब. वैद सँवलिया होय ॥३॥
(१) नहीं तो। (२) दूसरों। (३) चिड़ियों का सा तमाशा जो साँझ होते ही
बसेरे को उड़ जाती हैं।
७० मीरा बाई
(२)
नीँदलड़ी नहिँ आवै सारी रात, किस बिध होइ परभात¹॥टेक
चमक² उठी सपने सुध भूली, चंद्र कला न सुहात ।
तलफ तलफ जिव जाय हमारो, कब रे मिलै दोना-नाथ ॥
भइ हूँ दिवानी तनसुध भूली, कोई न जानी म्हाँरी बात ।
मीरा कहै बीती सोइ जानै, मरन जीवन उन हाथ ॥२॥
(३)
नैना म्हारे बान पड़ी, साँई मोहिँ दरस दिखाई ॥ टेक ॥
चित्त चढ़ी मेरे माधुरि मूरत, उर विच आन अड़ी ॥१॥
कैसे प्रान पिया बिनु राखूँ, जीवन मूर जड़ी³ ॥ २ ॥
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ, अपने भवन खड़ी ॥ ३ ॥
मीरा प्रभु के हाथ बिकानी, लोक कहै बिगड़ी ॥ ४ ॥
(४)
माई म्हाँरी हरि न बूझी बात ।
पिंड मैँ से प्राण पापी, निकस क्यूँ नहिँ जात ॥ १ ॥
रैन अँधेरी बिरह घेरी, तारा गिणत निस जात ।
ले कटारी कंठ चीरूँ, करूँगी अपघात ॥ २ ॥
पाट⁴ न खोल्या मुखाँ न बोल्या, साँझ लग परभात ।
अबोलना मैँ अवध बीती, काहे की कुसलात ॥ ३ ॥
सुपन मैँ हरि दरस दीन्हौँ, मैँ न जाग्यो हरि जात ।
नैन म्हाँरा उघड़⁵ आया, रही मन पछतात ॥ ४॥
आवन आवन होय रह्यो रे, नहिँ आवन की बात ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी रे, बाल ज्यौँ बिल्लात ॥ ५ ॥
(५)
घड़ी एक नहिँ आवड़े⁶, तुम दरसन बिन मोय ।
तुम ही मेरे प्राण जी, का सूँ जीवन होय ॥ १ ॥
(१) सवेरा । (२) चौंक । (३) बूटी । (४) परदा । (५) खुल गया । (६) सुहावै ।
धान१ न भावै नींद न आवै, विरह सतावै मोय।
घायल सी घूमत फिरूँ रे, मेरा दरद न जाने कोय ॥२॥
दिवस तो खाय गमाइयो रे, रैन गमाई सोय।
प्राण गमायो झूरताँ२ रे, नैन गमाई रोय ॥ ३ ॥
जो मैं ऐसा जानती रे, प्रीत किये दुख होय।
नगर ढँढोरा फेरती रे, प्रीत करो मत कोय ॥ ४ ॥
पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ, ऊबी३ मारग जोय।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलियाँ सुख होय ॥५॥
(६)
मैं अपने सैयाँ सँग साची।
अब काहे की लाज सजनी, प्रगट ह्वै नाची ॥ १ ॥
दिवस भूख न चैन कबहिन, नींद निसु नासी।
बेध वार को पार होइगो, ज्ञान गुह४ गाँसी ॥ २ ॥
कुल कुटुँब सब आनि बैठे, जैसे मधु मासी५।
दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी ॥ ३ ॥
(७)
नातो६ नाम को मो सूँ, तनक न तोड़्यो जाय ॥ टेक ॥
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग।
छाने७ लाँघन८ मैं किया रे, राम मिलन के जोग ॥ १ ॥
बाबल९ बैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह१०।
मूरख बैद मरम नहिँ जाने, करक११ कलेजे माँह ॥ २॥
जाओ बैद घर आपने रे, म्हाँरो नाँव न लेय।
मैं तो दाधी१२ विरह की रे, काहे कूँ औषध१३ देय ॥ ३॥
शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:
(१) अन्न। (२) बिलक बिलक कर। (३) खड़ी। (४) गुप्त। (५) शहद की
मक्खी। (६) रिश्ता। (७) छिप कर। (८) फ़ाक़ा। (९) बाप। (१०) नाड़ी।
(११) दर्द। (१२) जली हुई। (१३) दवा।
७२ मीरा बाई
माँस-गलि गलि छीजिया रे, करक रह्या गल आहि १ ।
आँगुलियाँ की मूँदड़ी, म्हाँरे आवन लागी बाँहि ॥४॥
रहु रहु पापी पपीहा रे, पिव को नाम न लेय ।
जे कोइ बिरहन साम्हले २, तो पित्र कारन जिव देय ॥५॥
खिन मन्दिर खिन आँगने रे, खिन खिन ठाढ़ी होय ।
घायल ज्यूँ घूमूँ खड़ी, म्हाँरी विथा न बूझे कोय ॥६॥
काढ़ि कलेजो मैं धरूँ रे, कौवा तू ले जाय ।
ज्याँ देखाँ म्हाँरो पिव बसै रे, वे देखत तू खाय ॥७॥
म्हाँरे नातो नाम को रे, और न नातो कोय ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी रे, पिय दरसन दीज्यो मोय ॥८॥
(८)
दरस बिन दूखन लागे नैन ॥ टेक ॥
जब से तुम बिछरे मेरे प्रभुजी, कबहुँ न पायौँ चैन ॥१॥
सबद सुनत मेरी छतिया कंपै, मीठे लगे तुम वैन ॥२॥
एक टकटकी पंथ निहारूँ, भई छमासी रैन ॥३॥
बिरह बिथा कासूँ कहूँ सजनी, बह गइ करवत ऐन ॥४॥
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटन सुख देन ॥५॥
(९)
मतवारो बादल आयो रे,
हरि को सँदेसो कुछ नहिँ लायो रे ॥ टेक ॥
दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनायो रे ।
कारी अँधियारी बिजली चमके, बिरहन अति डरपायो रे ॥१
गाजे बाजे पवन मधुरिया, मेहा अति झड़ लायो रे ।
फूँके ३ काली नाग बिरह की जारी, मीरा-मन हरि भायो रे ॥२
(१) हाड़। (२) सुन पावै। (३) साँप फूपकार मारता है।
शब्द संग्रह ७३
(१०)
होली
रमैया बिन नींद न आवे ।
नींद न आवे बिरह सतावे, प्रेम की आँच दुलावे१ ॥टेक॥
बिन पिया जोत मंदिर अँधियारो, दीपक दाय२ न आवे।
पिया बिना मेरी सेज अलूनी३, जागत रैन बिहावे४,
पिया कब रे घर आवे ॥१॥
दादुर स़ोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनावे ।
घुमँड़ घटा ऊलर५ होइ आई, दामिनि दमक डरावे,
नैन झर लावे ॥२॥
कहा करूँ कित जाउँ मोरी सजनो, बेदन कून बुतावे६ ।
बिरह नागिन मोरी काया डसी है, लहर लहर जिव जावे,
जड़ी घस लावे ॥ ३ ॥
को है सखी सहेली सजनी, पिया कूँ आन मिलावे ।
मीरा कूँ प्रभु कब रे मिलोगे, मनमोहन मोहिँ भावे,
कबै हँस करि बतलावे७ ॥ ४ ॥
(११)
होली
होली पिया बिन मोहिँ न भावै, घर आँगन न सुहावै ॥टेक॥
दीपक जोय कहा करूँ हेली, पिय परदेस रहावे ।
सूनी सेज जहर ज्यूँ लागे, सुसक सुसक जिय जावे,
नींद नैन नहि आवे ॥ १ ॥
कब की ठाढ़ी मैं मग जोऊँ, निस दिन बिरह सतावे ।
कहा कहूँ कछु कहत न आवे, हिवड़ो अति अकुलावे,
पिया कब दरस दिखावे ॥ २ ॥
(१) सुलगाना । (२) पसंद । (३) फीकी । (४) बीते । (५) चढ़ना । (६)
बुझावे, शांत करे । (७) बोले ।
१०
७४ मीरा बाई
ऐसा है कोइ परम सनेही, तुरत सँदेसा लावै ।
वा विरियाँ कब होसी मो कूँ, हँस करि निकट बुलावै
मीरा मिलि होरी गावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
आली साँवरे कि दृष्टि, मानो प्रेम की कटारी है ॥टेक।
लागत बेहाल भई, तन की सुधि बुद्धि गई ।
तन मन ब्यापो प्रेम मानो मतवारी है ॥ १ ॥
सखियाँ मिलि दोइ चारी, बावरी सी भई न्यारी ।
हौँ१ तो वा को नीके जानौँ, कुंज को बिहारी है ॥२॥
चंद को चकोर चाहै, दीपक पतंग दाहै ।
जल बिना मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है ॥३॥
बिनती करौँ हे स्याम, लागौँ मैं तुम्हारे पास२ ।
मीरा प्रभु ऐसे जानो, दासी तुम्हारी है ॥ ४ ॥
(२)
जावो हरि निरमोहड़ा३ रे, जानी थाँरी प्रीत ॥ टेक ॥
लगन लगी जब और प्रीत छी४, अब कुछ अँवलो५ रीत ॥१॥
अमृत पाय बिषै क्यूँ दीजे, कौन गाँव की रीत ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत ॥३॥
(३)
जब से मोहिँ नंद नँदन दृष्टि पड़्यो माई ।
तब से परलोक लोक कछू ना सुहाई ॥ १ ॥
मोरन की चंद्र कला सीस मुकुट सोहै ।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै ॥ २ ॥
।(१) मैं । (२) पाँव । (३) निरमोही । (४) थी । (५) उलटा ।
शब्द संग्रह ७५
कुंडल की अलक झलक कपोलन पर छाई ।
मनो१ मीन सरवर तजि सकर२ मिलन आई ॥ ३ ॥
कुटिल भृकुटि३ तिलक भाल चितवन मैँ टोना ।
खंजन४ अरु मधुप५ मीन भूले मृग छौना६ ॥ ४ ॥
सुंदर अति नासिका सुग्रीव७ तीन रेखा ।
नटवर८ प्रभु भेष धरे रूप अति विसेषा ॥ ५ ॥
अधर बिंब अरुन नैन मधुर मंद हाँसी ।
दसन६ दमक दाड़िम१० दुति११ चमके चपला१२ सी ॥ ६ ॥
छुद्र घंट किंकिनी१३ अनूप धुनि सुहाई ।
गिरधर के अंग अंग मीरा बलि जाई ॥ ७ ॥
(४)
या मोहन के मैं रूप लुभानी ॥ टेक ॥
हाट बाट मोहिँ रोकत टोकत,
या रसिया की मैं सार न जानी ॥ १ ॥
सुंदर बदन कमल-दल लोचन,
बाँकी चितवन मंद मुसकानी ॥ २ ॥
जमुना के नीरे तीरे धेनु चरावत,
बंसी मैं गावत मीठी बानी ॥ ३ ॥
तन मन धन गिरधर पर वारूँ,
चरन कमल मीरा लपटानी ॥ ४ ॥
(१) मानो, गोया कि । (२) मगर । (३) भौँ । (४) खेड़रिच चिड़िया । (५)
भौंरा । (६) बच्चा । (७) सुंदर गला । (८) नट के समान काछनी काछे ।
(६) दाँत । (१०) अनार । (११) प्रकाश । (१२) बिजली । (१३) छोटी छोटी घंटियाँ
जो करधनी में पोह देते हैं ।
७६ मीरा बाई
(५)
निपट बंकट¹ छबि, अटके मेरे नैना ॥ टेक ॥
देखत रूप मदन मोहन को, पियत पीयूष² न मटके³ ॥१॥
बारिजें⁴ भँवाँ अलक⁵ टेढ़ी मनो, अति सुगंधि रस अटके ॥
टेढ़ी कटि⁶ टेढ़ी कर मुरली, टेढ़ी पाग लर⁷ लटके ॥३॥
मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरधर नागर नट के ॥४॥
(६)
बरखे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की ॥टेक॥
सावन मैं उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की ॥१॥
उमड़ घुमड़ चहुँ दिस से आयो,दामिन दमके झरलावन की ॥२॥
नन्ही नन्ही बूँदन मेहा बरसे, सीतल पवन सुहावन की ॥३॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आनँद मंगल गावन की ॥४॥
॥ बिनय ॥
(१)
पियां मोहिं आरत तेरी हो ।
आरत तेरे नाम की मोहिं साँझ सबेरी हो ॥ १ ॥
या तन को दियना करैँ मनसा करैँ बाती हो ।
तेल भरावैँ प्रेम का बारौँ दिन राती हो ॥ २ ॥
पटियाँ पारौँ गुर ज्ञान की सुमति माँग सवारौँ हो ।
पिया तेरे कारने धन जोबन वारौँ हो ॥ ३ ॥
सेजड़िया बहु-रंगिया चंगा फूल बिछाया हो ।
रैन गई तारा गिणत प्रभु अजहुँ न आया हो ॥ ४ ॥
सावन भादौँ ऊमड़ो बरखा रितु छाई हो ।
भौंह घटा घन घेरि के नैनन भरि लाई हो ॥ ५ ॥
(१) बाँकी । (२) अमृत । (३) मुड़े । (४) कँवल । (५) बाल की लट । (६)
कमर । (७) पेंच ।
शब्द संग्रह ७७
मात पिता तुम को दियो तुम हीं भल जानो हो१ ।
तुम तजि और भतार को मन मैं नहिँ आनेौँ हो ॥ ६॥
तुम हो पूरे साइयाँ पूरन पद दीजै हो ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी अपनी करि लीजै हो ॥ ७ ॥
(२)
तुम पलक उघाड़े दीनानाथ, हूँ हाजिर नाजिर कब की खड़ी ॥टेक
साऊ२ थे दुसमन होइ लागे, सब ने लगूँ कड़ी३ ।
तुम बिन साऊ कोऊ नहीं है, डिगी४ नाव मेरी समँद अड़ी १
दिन नहिँ चैन रात नहिँ निदरा, सूखूँ खड़ी खड़ी ।
बान बिरह के लगे हिये मैं, भूलूँ न एक घड़ी ॥२।
पत्थर की तो अहिल्या तारी, बन के बीच पड़ी ।
कहा बोझ मीरा मैं कहिये, सौ ऊपर एक धड़ी५ ॥३॥
गुरु रैदास मिले मोहिँ पूरे, धुर से कलम भिड़ी ।
सतगुरु सैन दई जब आ के, जोत मैं जोत रली ॥४॥
॥ उपदेश ॥
राम नाम रस पीजे मनुवाँ, राम नाम रस पीजे ॥टेक॥
तज कुसंग सतसंग बैठ नित, हरि चरचा सुण लीजे ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह कूँ, चित से बहाय दीजे ॥२॥
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ताहि के रँग मैं भींजै ॥३॥
(१) देखो जीवन-चरित्र मीरा बाई का उनकी शब्दावली के ग्रंथ में।
(२) रक्षक। (३) कड़वी। (४) झकोला खाती है। (५) पसेरी।
नरसी मेहता जी
जीवन समय—सत्रहवाँ शतक । रचना काल—१६३० । जन्म स्थान—
जूनागढ़ [गुजरात]। जाति और आश्रम—गुजराती ब्राह्मण, गृहस्थ ।
इन के मा बाप बचपन ही में मर गये थे इसलिये भाई भावज के साथ
रहने लगे। फिर भावज के कुटिल वचन के कारण उसका घर भी छोड़ दिया और
एक शिवाले में सात दिन तक भूखे प्यासे पड़े रहे; शिवजी की कृपा से बृंदावन
आकर साक्षात दर्शन श्रीकृष्ण का पाया। बृंदावन से जूनागढ़ लौट आये और वहाँ
एक घर अलग बनाकर अपना ब्याह कर लिया जिस से एक बेटा और दो बेटी
उत्पन्न हुए। इन की ईश्वर-भक्ति जगत-विख्यात है और इन की हुंडी की
कथा जो साधुओं की एक जमात के आग्रह वस इन्हों ने साँवल साह पर
द्वारका को लिख दी और जिस का दाम श्रीकृष्ण ने आप साहूकार का रूप धारण
करके चुकाया भक्तमाल में दी है।
(१)
म्हाॅँने पार उतारो जी, थाँने निज भक्तन की आन ।
हमरे अवगुन नेक न चितवो, अपनो ही करि जान ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह बस, भूल्यो पद निर्वान ।
अब तो सरन गही चरनन की, मत दीजो मोहिं जान ॥२॥
लख चौरासी भरमत भरमत, नेक न परी पिछान ।
भवसागर मैं बह्यो जात हौँ, रखिये स्याम सुजान ॥३॥
हौँ तो कुटिल अधम अपराधी, नहिँ सुमिरयो तेरो नाम ।
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, गावत बेद पुरान ॥४॥
(२)
कहाँ लगाई एती देर, अरे अरे साँवरे ॥ टेक ॥
हौँ गुजराती सिव को उपासी, पूजौँ साँझ सबेर ॥१॥
भक्ति मर्म को सार न जानौँ, हाँसी कराई मेरी ढेर ॥२॥
ऊँचे चढ़ि के टेर सुनाऊँ, अब सुनिये म्हारी टेर ॥३॥
क्या काहूँ काज सँवारे भक्तन के, क्या निद्रा ने लिये घेर ॥४॥
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, राखिये अब की बेर ॥५॥
गुसाईं तुलसीदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ७१ ]
॥ प्रेम ॥
ये दोउ झूलत रंग हिंडोरैं ।
दसरथ-सुत अरु जनक-नंदनी, चितवन मैं चित चोरैं ॥१॥
नान्ही नान्ही बूँद पवन पुरवैया, बरसत थोरैं थोरैं ।
हरि हरि भूमि घटा झुकि आईं, सरजू लेत हिलोरैं ॥२॥
हय दल पैदल गज दल रथ दल, कोटि बने चहुँ ओरैं ।
उपवन माहिं मधुर सुर बोलैं, कोकिल मोर चकोरैं ॥३॥
रत्न जड़ित को बन्यो हिंडोरा, रेसम लागी डोरैं ।
अरस परस दोउ झूल झुलावैं, इक साँवर इक गोरैं ॥४॥
वा मैं बिमल सखी उरझानी, अपनी अपनी ओरैं ।
तुलसिदास अनुकूल जानि के, सियाजी हँसीं मुख मोरैं ॥५॥
॥ विनय ॥
(१)
काहे तैं हरि मोहिं बिसारो ।
जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सम्हारो ॥१॥
पतित-पुनीत दीनहित, असरण-सरण कहत श्रुति चारो ।
हौं नहिं अधम सभीत दीन, किधौं वेदन मृषा पुकारो ॥२॥
खग गणिका गज ब्याध पाँति जहँ, तहँ हौं हूँ बैठारो ।
अब केहि लाज कृपानिधान, परसत पनवारा फारो ॥३॥
- शब्द १ विनय के अर्थ—हे हरि मुझ को क्यों भूले जाते हो, तुम तो अपनी बड़ाई
और मेरे दोष दोनों को जानते हो फिर मुझे क्यों नहीं सम्हालते। चारो वेद आप
के पतितपावन, दुखिया के हितकारी, असरन की सरन होने की महिमा गाते हैं
फिर जो आप मुझ सरीखे अधम, संसारी भय मानने वाले और अव्वल दुखिया के
८० गुसाईँ तुलसीदासजी
मसक बिरंचि बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाव तुम्हारो ।
यह सामर्थ्य अछत मोहिँ त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥४॥
जनहि न नरक परत मोकहँ डर, यद्यपि हौँ अति हारो ।
यह बड़ि त्रास दास तुलसी, प्रभु नामहुँ पाप न जारो ॥५॥
(२)
केसव कारन कवन गुसाईँ ।
जेहि अपराध असाधु जानि मोहिँ, तज्यो अज्ञ १की नाईँ ॥१॥
परम पुनीत सन्त कोमल चित, तिन्हहिँ तुमहिँ बनि आई ।
तौ बिप्र ब्याध गनिकहिँ कस तार्यो, का कछु रही सगाई २॥२॥
काल कर्म गति अगति जीव की, सब हरि हाथ तुम्हारे ।
सोइ कछु करहु हरहु ममता मम, फिरहु ३न तुमहिँ बिसारे ॥३॥
जौँ तुम तजहु भजौँ न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे ।
मन बच कर्म नरक सुरपुर जहँ, तहँ रघुबीर निहोरे ॥४॥
तारने में देर लगाते हौ तो सिवाय इस के क्या कहा जाय कि या तो मेरे समस्त
औगुनों में निपुन होने में कसर है या आप की महिमा वेदों ने मिथ्या भाखी है।
आप के प्रन के सहारे मैं खग [जटायु], गणिका [वेश्या], गज, और व्याधा जिस
ने श्रीकृष्ण के चरन में तीर मारा था ऐसे अधमों की पाँति में बैठाया गया तो
फिर पंगत में बैठाल्ने के पीछे कौन लाज आप को लगती है कि परोसने के समय
मेरी पत्तल को फाड़ते हौ। आप का सुभाव है कि छिन में मच्छड़ को ब्रह्मा
और ब्रह्मा को मच्छड़ बना देते हौ। फिर ऐसे समरथ होकर जो मुझे त्यागते हौ
तो मेरा क्या बस है। सो यद्यपि मैं जनम भर पाप करते २ अति थक गया हूँ
फिर भी मुझे नर्क में पड़ने का डर नहीं है पर यह चिन्ता अवश्य है कि द्रोही
हँसेंगे कि नाम भी पापों को नहीं काट सका।
(१) अनजान बन कर । (२) जो तुम केवल पवित्र सज्जनों को ही ग्रहन करते
होते तो अजामिल बिप्र, ब्याध, गनिका इत्यादि दुर्जन क्या तुम्हारे कोई नाते-
दार थे जो उनको तारा। (३) फिर भी। (४) जो तुम मुझे त्याग दोगे तौ भी यह
मेरा प्रन है कि दूसरे स्वामी को न भजूँगा, चाहे मुझे नर्क में डाल देव चाहे देव
लोक में पहुँचाओ मैं मनसा वाचा कर्मना तुम्हाराही जस गाऊँगा।
शब्द संग्रह ८१
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौँ करौँ ढिठाई ।
तुलसिदास सीदत¹ निसि दिन, देखत तुम्हारि निठुराई ॥५
(३)
माधव अब न द्रवहु² केहिँ लेखे ।
प्रनतपाल³ पन तोर, मोर पन जियउँ कमल पद देखे ॥१॥
जब लगि मैं न दीन दयाल तैं, मैं न दास तैं स्वामी ।
तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिँ, जद्यपि अन्तर्जामी ॥२
तैं उदार मैं कृपन पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै ।
बहुत नात रघुनाथ तोहिँ मोहिँ, अब न तजे बनि आवै ॥३
जनक जननि गुरु बन्धु सुहृद पति, सब प्रकार हितकारी ।
द्वैत रूप तम कूप परौँ नहिँ, अस कछु जतन बिचारी⁴॥४
सुनु अदभ्र करुना बारिज-लोचन, मोचन भय भारी ।
तुलसिदास प्रभु तब प्रकास बिनु, संसय टरत न टारी⁵॥५
(४)
तू दयाल दीन हैँ, तू दानि हैँ भिखारी ।
हैँ प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ॥ १ ॥
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मो सौं ।
मो समान आरत नहिँ, आरत-हर तो सौँ ॥ २ ॥
(१) दुख पाता है। (२) पसीजते, दया करते। (३) जो एक बार भी प्रनाम
करै तिस का पालन करनेहारा । (४) पिता, माता, गुरू, भाई, मित्र, स्वामी, सब
प्रकार तुम्हीँ मेरे हितकारी हो सो ऐसा कुछ जतन करो कि द्वैत रूप अर्थात हौं
मैं के अंध-कूप मेंँ न गिर जाऊँ । (५) सुनो हे अधिक [अदभ्र] करुना-निधान
कमल-नैन, भयहरन प्रभु तुम्हारे प्रकाश बिना मेरा भ्रम अपने पुरुषार्थ से टाले
नहीं टलता ।
शब्द ४ का अर्थ—इस शब्द मे गुसाईँ जी ग्यारह नाते गिना कर अपने
इष्ट से विनय करते हैं कि जो नाता आप को भावै उसी एक को मान कर
मुझे चरन सरन मेंँ लीजिये ।
११
८२ गुसाईं तुलसीदासजी
ब्रह्म तू हौं जीव हौं, तू ठाकुर हौं चेरो ।
तात मात गुरु सखा तू, सब बिधि हित मेरो ॥ ३ ॥
तोहि मोहिं नातो अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यौँ त्यौँ तुलसी, कृपालु चरन सरन पावै ॥ ४ ॥
(५)
हरि जू मेरो मन हठ न तजै ।
निसि दिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाव निजै ॥१
ज्यौँ जुवती अनुभवत प्रसव¹ अति, दारुन दुख उपजै ।
ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ, पुनि खल पतिहिँ भजै ॥२॥
लोलुप भ्रमत श्रमित निसि बासर, सिर पदत्रान बजै ।
तदपि अधम बिचरत तेहिँ मारग, कबहूँ न मूढ़ लजै ॥३॥²
हौं हार्यो करि जतन विविधि बिधि, अतिसय प्रबल अजै³ ।
तुलसिदास बस होत तबै, जन प्रेरक प्रभु बरजै ॥ ४ ॥
(६)
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोई ।
जाहि दीनता कहौँ हौं दीन देखौँ सोई⁴ ॥ १ ॥
मुनि सुर नर नाग असुर साहिब तै घनेरे ।
पै तै। लौं जौ लौं रावरे न नेकु नैन फेरे⁵ ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल बिदित बदत⁶ बेद चारी ।
आदि अंत मध्य राम साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
(१) जनने का दुख सहती है। (२) जैसे लालची रात दिन रुपया कमाने के फेर
में थक जाता है और जूतियाँ खाता है फिर भी वही चाल चलता है और लाज
नहीं लाता । (३) अजीत । (४) ईश्वर को छोड़ दूसरा दीनता छुड़ाने का समर्थ
नहीं है, जिस किसी से अपनी दीनता का दुख रोता हूँ उसी को आप दीन
दुखी अर्थात असमर्थ पाता हूँ । (५) सुर नर मुनि आदि की जभी तक प्रभुता
है जब तक तेरो भौं उनकी ओर टेढ़ी नहीं होती । (६) कहता है ।
तोहि माँगे माँगने न माँगना कहायो१ ।
सुनि सुभाव सील सुजस जाचक जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन पसु विटप विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के रंक राव कीन्हे ॥ ५ ॥२
तू गरीब को निवाज हौं गरीब तेरो ।
वारक३ कहिये कृपालु तुलसिदास मेरो ॥ ६ ॥
(७)
मैं हरि पतित-पावन सुने ।
मैं पतित तुम पतित-पावन, दोऊ बानिक४ बने ॥ १ ॥
ब्याध गनिका गज अजामिल, साखि निगमन भने ।
और अधम अनेक तारे, जात का पै गने ॥ २ ॥
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक जमपुर भने ।
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ ३ ॥
(८)
तुम सम दीन बन्धु, न दीन कोउ मो सम,
सुनहु नृपति रघुराई ।
मो सम कुटिल मैलिमनि५ नहिं जग,
तुम सम हरि न हरन कुटिलाई ॥ १ ॥
हौं मन बचन कर्म पातक-रत,
तुम कृपालु पतितन गति दाई ।
हौं अनाथ प्रभु तुम अनाथ-हित,
चित यह सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥ २ ॥
(१) जिस ने आप से माँगा वह फिर मंगता न रहा अर्थात परिपूर्ण हो गया ।
(२) दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र ने जिस जिस को अपनाया वह दरिद्री से राजा
होगया यहाँ तक कि पत्थर जैसे अहिल्या, जानेवर [बंदर भालू], पेड़
[ यमलार्जुन ], चिड़िया [ जटायु ] की योनियों तक से दीन दुखियों का उद्धार
कर दिया । (३) एक बेर । (४) सुभाव, वज़ा । (५) दुष्टों का शिरोमनि, कुटीचर ।