संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 90, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ८१
जद्यपि नाथ उचित न होत अस, प्रभु सौँ करौँ ढिठाई ।
तुलसिदास सीदत¹ निसि दिन, देखत तुम्हारि निठुराई ॥५
(३)
माधव अब न द्रवहु² केहिँ लेखे ।
प्रनतपाल³ पन तोर, मोर पन जियउँ कमल पद देखे ॥१॥
जब लगि मैं न दीन दयाल तैं, मैं न दास तैं स्वामी ।
तब लगि जो दुख सहेउँ कहेउँ नहिँ, जद्यपि अन्तर्जामी ॥२
तैं उदार मैं कृपन पतित मैं, तैं पुनीत श्रुति गावै ।
बहुत नात रघुनाथ तोहिँ मोहिँ, अब न तजे बनि आवै ॥३
जनक जननि गुरु बन्धु सुहृद पति, सब प्रकार हितकारी ।
द्वैत रूप तम कूप परौँ नहिँ, अस कछु जतन बिचारी⁴॥४
सुनु अदभ्र करुना बारिज-लोचन, मोचन भय भारी ।
तुलसिदास प्रभु तब प्रकास बिनु, संसय टरत न टारी⁵॥५
(४)
तू दयाल दीन हैँ, तू दानि हैँ भिखारी ।
हैँ प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज हारी ॥ १ ॥
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मो सौं ।
मो समान आरत नहिँ, आरत-हर तो सौँ ॥ २ ॥
(१) दुख पाता है। (२) पसीजते, दया करते। (३) जो एक बार भी प्रनाम
करै तिस का पालन करनेहारा । (४) पिता, माता, गुरू, भाई, मित्र, स्वामी, सब
प्रकार तुम्हीँ मेरे हितकारी हो सो ऐसा कुछ जतन करो कि द्वैत रूप अर्थात हौं
मैं के अंध-कूप मेंँ न गिर जाऊँ । (५) सुनो हे अधिक [अदभ्र] करुना-निधान
कमल-नैन, भयहरन प्रभु तुम्हारे प्रकाश बिना मेरा भ्रम अपने पुरुषार्थ से टाले
नहीं टलता ।
शब्द ४ का अर्थ—इस शब्द मे गुसाईँ जी ग्यारह नाते गिना कर अपने
इष्ट से विनय करते हैं कि जो नाता आप को भावै उसी एक को मान कर
मुझे चरन सरन मेंँ लीजिये ।
११