संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६७
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीता¹ करत निषंग² ।
सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग ॥ ४ ॥
(२)
सब दिन होत न एक समान ॥ टेक ॥
इक दिन राजा हरीचंद गृह, संपति मेरु समान ।
इक दिन जाय स्वपच गृह सेवत, अंचर हरत मसान ॥१॥
इक दिन दूलह बनत बराती, चहुँ दिसि गड़त निसान ।
इक दिन डेरा होत जँगल मैं, कर सूधे पग तान ॥२ ॥
इक दिन सीता रुदन करत है, महा विषम उद्यान³ ।
इक दिन रामचन्द्र मिलिदोऊ, विचरत पुष्प विमान ॥३॥
इक दिन राजा राज जुधिष्टिर, अनुचर श्रीभगवान ।
इक दिन द्रोपदि नग्न होत है, चीर दुसासन तान ॥४ ॥
प्रगटत है पूरब की करनी, तजु मन सोच अजान ।
सूरदास गुन कहँ लग वरनौँ, विधि के अंक⁴ प्रमान ॥५॥
स्वामी हरिदास
यह एक भारी कृष्ण भक्त हुए जो सोलहवें शतक के पिछले हिस्से से सत्रहवें
शतक के अगले हिस्से तक विराजमान थे। ललिता सखी के अवतार समझे
जाते हैं। गान विद्या मैं यह बड़े निपुन प्रसिद्ध तानसेन के गुरू थे। अकबर
वादशाह जो इन का समकालीन था एक वार तानसेन के साथ इन के दर्शन को
आया था। इन के कई एक ग्रंथ हैं जिन मैं से भरथरी-वैराग्य और रस के पद
प्रसिद्ध हैं। भरथरी-वैराग्य संबत १६०७ मैं और पद १६१७ मैं बनाये गये।
(१)
गायो न गोपाल मन लाइ के निवारि लाज ।
पायो न प्रसाद साधु मण्डली मैं जाइ के ॥ १ ॥
(१) ख़ाली । (२) तरकश । (३) भारी, जंगल मैं । (४) ब्रह्मा का कर्म्म लेख ।