संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० गुसाईँ तुलसीदासजी
मसक बिरंचि बिरंचि मसक सम, करहु प्रभाव तुम्हारो ।
यह सामर्थ्य अछत मोहिँ त्यागहु, नाथ तहाँ कछु चारो ॥४॥
जनहि न नरक परत मोकहँ डर, यद्यपि हौँ अति हारो ।
यह बड़ि त्रास दास तुलसी, प्रभु नामहुँ पाप न जारो ॥५॥
(२)
केसव कारन कवन गुसाईँ ।
जेहि अपराध असाधु जानि मोहिँ, तज्यो अज्ञ १की नाईँ ॥१॥
परम पुनीत सन्त कोमल चित, तिन्हहिँ तुमहिँ बनि आई ।
तौ बिप्र ब्याध गनिकहिँ कस तार्यो, का कछु रही सगाई २॥२॥
काल कर्म गति अगति जीव की, सब हरि हाथ तुम्हारे ।
सोइ कछु करहु हरहु ममता मम, फिरहु ३न तुमहिँ बिसारे ॥३॥
जौँ तुम तजहु भजौँ न आन प्रभु, यह प्रमान पन मोरे ।
मन बच कर्म नरक सुरपुर जहँ, तहँ रघुबीर निहोरे ॥४॥
तारने में देर लगाते हौ तो सिवाय इस के क्या कहा जाय कि या तो मेरे समस्त
औगुनों में निपुन होने में कसर है या आप की महिमा वेदों ने मिथ्या भाखी है।
आप के प्रन के सहारे मैं खग [जटायु], गणिका [वेश्या], गज, और व्याधा जिस
ने श्रीकृष्ण के चरन में तीर मारा था ऐसे अधमों की पाँति में बैठाया गया तो
फिर पंगत में बैठाल्ने के पीछे कौन लाज आप को लगती है कि परोसने के समय
मेरी पत्तल को फाड़ते हौ। आप का सुभाव है कि छिन में मच्छड़ को ब्रह्मा
और ब्रह्मा को मच्छड़ बना देते हौ। फिर ऐसे समरथ होकर जो मुझे त्यागते हौ
तो मेरा क्या बस है। सो यद्यपि मैं जनम भर पाप करते २ अति थक गया हूँ
फिर भी मुझे नर्क में पड़ने का डर नहीं है पर यह चिन्ता अवश्य है कि द्रोही
हँसेंगे कि नाम भी पापों को नहीं काट सका।
(१) अनजान बन कर । (२) जो तुम केवल पवित्र सज्जनों को ही ग्रहन करते
होते तो अजामिल बिप्र, ब्याध, गनिका इत्यादि दुर्जन क्या तुम्हारे कोई नाते-
दार थे जो उनको तारा। (३) फिर भी। (४) जो तुम मुझे त्याग दोगे तौ भी यह
मेरा प्रन है कि दूसरे स्वामी को न भजूँगा, चाहे मुझे नर्क में डाल देव चाहे देव
लोक में पहुँचाओ मैं मनसा वाचा कर्मना तुम्हाराही जस गाऊँगा।