संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंनरसी मेहता जी
जीवन समय—सत्रहवाँ शतक । रचना काल—१६३० । जन्म स्थान—
जूनागढ़ [गुजरात]। जाति और आश्रम—गुजराती ब्राह्मण, गृहस्थ ।
इन के मा बाप बचपन ही में मर गये थे इसलिये भाई भावज के साथ
रहने लगे। फिर भावज के कुटिल वचन के कारण उसका घर भी छोड़ दिया और
एक शिवाले में सात दिन तक भूखे प्यासे पड़े रहे; शिवजी की कृपा से बृंदावन
आकर साक्षात दर्शन श्रीकृष्ण का पाया। बृंदावन से जूनागढ़ लौट आये और वहाँ
एक घर अलग बनाकर अपना ब्याह कर लिया जिस से एक बेटा और दो बेटी
उत्पन्न हुए। इन की ईश्वर-भक्ति जगत-विख्यात है और इन की हुंडी की
कथा जो साधुओं की एक जमात के आग्रह वस इन्हों ने साँवल साह पर
द्वारका को लिख दी और जिस का दाम श्रीकृष्ण ने आप साहूकार का रूप धारण
करके चुकाया भक्तमाल में दी है।
(१)
म्हाॅँने पार उतारो जी, थाँने निज भक्तन की आन ।
हमरे अवगुन नेक न चितवो, अपनो ही करि जान ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह बस, भूल्यो पद निर्वान ।
अब तो सरन गही चरनन की, मत दीजो मोहिं जान ॥२॥
लख चौरासी भरमत भरमत, नेक न परी पिछान ।
भवसागर मैं बह्यो जात हौँ, रखिये स्याम सुजान ॥३॥
हौँ तो कुटिल अधम अपराधी, नहिँ सुमिरयो तेरो नाम ।
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, गावत बेद पुरान ॥४॥
(२)
कहाँ लगाई एती देर, अरे अरे साँवरे ॥ टेक ॥
हौँ गुजराती सिव को उपासी, पूजौँ साँझ सबेर ॥१॥
भक्ति मर्म को सार न जानौँ, हाँसी कराई मेरी ढेर ॥२॥
ऊँचे चढ़ि के टेर सुनाऊँ, अब सुनिये म्हारी टेर ॥३॥
क्या काहूँ काज सँवारे भक्तन के, क्या निद्रा ने लिये घेर ॥४॥
नरसी के प्रभु अधम-उधारन, राखिये अब की बेर ॥५॥