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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 267 में से

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पृष्ठ 92

तोहि माँगे माँगने न माँगना कहायो१ ।
सुनि सुभाव सील सुजस जाचक जन आयो ॥ ४ ॥
पाहन पसु विटप विहँग अपने करि लीन्हे ।
महाराज दसरथ के रंक राव कीन्हे ॥ ५ ॥२
तू गरीब को निवाज हौं गरीब तेरो ।
वारक३ कहिये कृपालु तुलसिदास मेरो ॥ ६ ॥
(७)
मैं हरि पतित-पावन सुने ।
मैं पतित तुम पतित-पावन, दोऊ बानिक४ बने ॥ १ ॥
ब्याध गनिका गज अजामिल, साखि निगमन भने ।
और अधम अनेक तारे, जात का पै गने ॥ २ ॥
जानि नाम अजानि लीन्हें, नरक जमपुर भने ।
दास तुलसी सरन आयो, राखिये आपने ॥ ३ ॥
(८)
तुम सम दीन बन्धु, न दीन कोउ मो सम,
सुनहु नृपति रघुराई ।
मो सम कुटिल मैलिमनि५ नहिं जग,
तुम सम हरि न हरन कुटिलाई ॥ १ ॥
हौं मन बचन कर्म पातक-रत,
तुम कृपालु पतितन गति दाई ।
हौं अनाथ प्रभु तुम अनाथ-हित,
चित यह सुरति कबहुँ नहिं जाई ॥ २ ॥


(१) जिस ने आप से माँगा वह फिर मंगता न रहा अर्थात परिपूर्ण हो गया ।
(२) दशरथ के पुत्र श्रीरामचंद्र ने जिस जिस को अपनाया वह दरिद्री से राजा
होगया यहाँ तक कि पत्थर जैसे अहिल्या, जानेवर [बंदर भालू], पेड़
[ यमलार्जुन ], चिड़िया [ जटायु ] की योनियों तक से दीन दुखियों का उद्धार
कर दिया । (३) एक बेर । (४) सुभाव, वज़ा । (५) दुष्टों का शिरोमनि, कुटीचर ।