संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ सूरदासजी
कारन करन अनन्त अजित कहँ, केहिँ विधि चरन रै ।
यह कलिकाल चलत नहिं मो पै, सूर सरन उबरै ॥ ॥
(१०)
अब हैँ नाच्यो बहुत गोपाल ॥ टेक ॥
काम क्रोध को पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल ।
महा मोह के नूपुर बाजत, निन्दा सबद रसाल ॥ १ ॥
तृस्ना नाद करत घट भीतर, नाना बिधि की ताल ।
माया को कटि१ फेटा बाँध्यो, लोभ तिलक दियो भाल२॥२
कोटिक कला नाच दिखराई, जल थल सुधि नहिँ काल ।
सूरदास की सभी अबिद्या, दूर करो नँदला॰ ॥ ३ ॥
(११)
मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसा निमक-हरामी ॥१॥
भरि भरि उदर बिषय को धावौँ, जैसे सूकर ग्रामी३ ।
हरि-जन छाड़ हरि-बिमुखन की, निसिदिन करतगुलामी॥२
पापी कौन बड़ो है मो तैं, सब पतितन मैं नामी ।
सूर पतित को ठौर कहाँ है, सुनिये श्रीपति४ स्वामी ॥३॥
॥ उपदेश ॥
(१)
छाडु मन हरि बिमुखन को संग ।
कहा भयो पय पान कराये, विष नहिँ तजत भुवंग ॥१॥
जा के संग कुबुद्धी उपजै, परत भजन मैं भंग ।
काम क्रोध मद लोभ मोह मैँ, निस दिन रहत उमंग ॥२॥
कागहि कहा कपूर खवाये, स्वान न्हवाये गंग ।
खर को कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग ॥ ३ ॥
(१) कमर । (२) सिर । (३) गाँव का सुअर । (४) लक्ष्मी के पति अर्थात विष्णु ।