संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६६
सगुरा सूरा अमृत पीवे, निगुरा प्यासा जाती।
मगन भया मेरा मन सुख मैं, गौबिंद का गुन गाती ॥२॥
साहिब पाया आदि अनादी, नातर १ भव मैं जाती।
मीरा कहे इक आस आप की, ओराँ २ सँ सकुचाती ॥३॥
(२)
भज मन चरन कँवल अविनासी ॥ टेक ॥
जेताइ दीसै धरनि गगन बिच, तेताइ सब उठि जासी ।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे. कहा लिये करवत कासी ॥१
इस देही का गरब न करना, माटी मैं मिल जासी ।
यो संसार चहर ३ की बाजी, साँझ पद्याँ उठि जासी ॥२॥
कहा भयो है भगवा पहरुयाँ, घर तज भये सन्यासी ।
जोगी होय जुगति नहिं जानी, उलटि जनम फिर आसी ॥३
अरज करैँ अबला कर जोरे, स्याम तुम्हारी दासी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नांगर, काटो जम की फाँसी ॥४॥
॥ विरह ॥
(१)
हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय ॥टेक॥
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय ।
गगन मॅडल पै सेज पिया की, किस बिंध मिलना होय ॥१॥
घायल की गति घायल जानै, की जिन लाई होय ।
जौहरी को गत जौहरी जानै, की जिन जौहर होय ॥२॥
दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्या नहिं कोय ।
मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जब. वैद सँवलिया होय ॥३॥
(१) नहीं तो। (२) दूसरों। (३) चिड़ियों का सा तमाशा जो साँझ होते ही
बसेरे को उड़ जाती हैं।