संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ मीरा बाई
ऐसा है कोइ परम सनेही, तुरत सँदेसा लावै ।
वा विरियाँ कब होसी मो कूँ, हँस करि निकट बुलावै
मीरा मिलि होरी गावै ॥ ३ ॥
॥ प्रेम ॥
(१)
आली साँवरे कि दृष्टि, मानो प्रेम की कटारी है ॥टेक।
लागत बेहाल भई, तन की सुधि बुद्धि गई ।
तन मन ब्यापो प्रेम मानो मतवारी है ॥ १ ॥
सखियाँ मिलि दोइ चारी, बावरी सी भई न्यारी ।
हौँ१ तो वा को नीके जानौँ, कुंज को बिहारी है ॥२॥
चंद को चकोर चाहै, दीपक पतंग दाहै ।
जल बिना मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है ॥३॥
बिनती करौँ हे स्याम, लागौँ मैं तुम्हारे पास२ ।
मीरा प्रभु ऐसे जानो, दासी तुम्हारी है ॥ ४ ॥
(२)
जावो हरि निरमोहड़ा३ रे, जानी थाँरी प्रीत ॥ टेक ॥
लगन लगी जब और प्रीत छी४, अब कुछ अँवलो५ रीत ॥१॥
अमृत पाय बिषै क्यूँ दीजे, कौन गाँव की रीत ॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, आप गरज के मीत ॥३॥
(३)
जब से मोहिँ नंद नँदन दृष्टि पड़्यो माई ।
तब से परलोक लोक कछू ना सुहाई ॥ १ ॥
मोरन की चंद्र कला सीस मुकुट सोहै ।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै ॥ २ ॥
।(१) मैं । (२) पाँव । (३) निरमोही । (४) थी । (५) उलटा ।