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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 267 में से

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६८ मीरा बाई
धायो न धमक वृन्दाविपिन की कुंजन मैं।
रह्यो न सरन जाइ - विठुलेसराइ के ॥ २ ॥
नाथ जू न देखि छक्यो छिनहूँ छबीली छाँव।
सिंह पौरि पर्यो नाहिं सीसहुँ नवाइ के ॥ ३ ॥
कहै हरिदास तोहिँ लाज हू न आवै नेक।
जनम गँवाये ना कमायो कछु आइ के ॥ ४ ॥
(२)
गहौ मन, सब रस को रस सार ॥ टेक ॥
लोक वेद कुल करमै तजिये, भजिये नित्य विहार ॥१॥
गृह कामिनि कंचन-धन त्यागो, सुमिरौ स्याम उदार ॥२
गहि हरिदास रीति सन्तन को, गादी को अधिकार ॥३॥
मीरा बाई
जीवन समय—१५७३ से १६३० तक। जन्म स्थान—मौ० कुकड़ी (मेरता.
मारवाड़)। जाति और आश्रम—राठोर, गृहस्थ। गुरू—रैदासजी।
इन की अनूठी भक्ति जग-प्रसिद्ध है। यह जोधपुर के राठोर राव रंजीतसिंह
की एकलौती बेटी थीं और उदयपुर के युवराज कुँवर भाजराज से ब्याही गईं
जो राजगद्दी पर बैठने के पहिले ही मर गये। पति के देहान्त होने पर मीरा बाई के
देवर ने जो गद्दी पर बैठे इन को निरंतर भक्ति और साधु सेवा करने के कारन
बहुत सताया यहाँ, तक कि बाई जी को घर से भाग जाना पड़ा। कहते हैं कि
मीरा बाई अंत समय द्वारका में रनछोर जी की मूर्त्ति में समा कर अलोप होगईँ।
॥ चितावनी ॥
(१)
मनखा¹ जनम पदारथ पायो, ऐसो बहुर न आती ॥टेक॥
अब के मोसर² ज्ञान बिचारो, राम राम मुख गाती।
सतगुर मिलिया सुंज³ पिछानी, ऐसा ब्रह्म मैं पाती ॥१॥
(१) मनुष्य का। (२) अवसर। (३) सूझ।