संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ सूरदासजी
चतुर सुजान सभा मैं बैठे, दुःसासन अनरीति क ॰ ।
सुमिरन कियो द्रोपदी जबहीँ, खैँचत चीर उबारि ध ॥२
ध्रुव प्रहलाद रैनि दिन ध्यावै, प्रगट भये बैकुंठ पुरी ।
भारत मैं अरुही के अंडा, ता पर गज को घंट ढुरी ॥३॥
अंबरीष गृह आये दुर्बासा, चक्र सुदर्सन छाँहि करी१ ।
सूर के स्वामी गजराज उबारे, कृपा करी जगदीस हरी ॥४॥
(६)
दीनानाथ अब बार तुम्हारी ।
पतित-उधारन विरद२ जानि के, विगरी लेहु सँवारी ॥१॥
बालापन खेलत ही खोयो, जुवा विषय रस माते ।
वृद्ध भये सुधि प्रगटी मो को, दुखित पुकारत ता तैँ ॥२॥
सुतन्ह तज्यो त्रिय भ्रात तज्यो सब, तन तैँ त्वचा भइ न्यारी ।
स्रवन न सुनत चरन गति थाकी, नैन बहे जल धारी ॥३॥
पलित३ केस कफ कण्ठ अब रूंध्यो४, कल न परै दिन राती।
माया मोह न छाड़ै तृस्ना, यह दोऊ दुखदाती ॥ ४ ॥
अब यह व्यथा दूर करिये को, और न समरथ कोई ।
सूरदास प्रभु करुना-सागर, तुम तैँ होय सो होई ॥ ५ ॥
(७)
नाथ मोहिँ अबकी बेर उबारो ॥ टेक ॥
तुम नाथन के नाथ सुवामी, दाता नाम तिहारो ।
करमहीन जनम को अंधो, मो तैँ कौन नकारो ॥ १ ॥
(१) कथा है कि परम भक्त राजा अंबरीष को बिना अपराध दुर्बासा ऋषि
ने शाप देना चाहा जिस पर विष्णु के सुदर्शन चक्र ने दुर्बासा को खदेरा । मुनि
जी भागते २ विष्णु की शरण में पहुँचे पर उन्होंने अपने भक्त के अपराधी की
रक्षा करने मैं अपनी असमर्थ्यता प्रगट की और अंत को राजा अंबरीष के
शरणागत होने पर वह बचे । (२) प्रण । (३) पके । (४) घरघराना ।