संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुसाईं तुलसीदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ ७१ ]
॥ प्रेम ॥
ये दोउ झूलत रंग हिंडोरैं ।
दसरथ-सुत अरु जनक-नंदनी, चितवन मैं चित चोरैं ॥१॥
नान्ही नान्ही बूँद पवन पुरवैया, बरसत थोरैं थोरैं ।
हरि हरि भूमि घटा झुकि आईं, सरजू लेत हिलोरैं ॥२॥
हय दल पैदल गज दल रथ दल, कोटि बने चहुँ ओरैं ।
उपवन माहिं मधुर सुर बोलैं, कोकिल मोर चकोरैं ॥३॥
रत्न जड़ित को बन्यो हिंडोरा, रेसम लागी डोरैं ।
अरस परस दोउ झूल झुलावैं, इक साँवर इक गोरैं ॥४॥
वा मैं बिमल सखी उरझानी, अपनी अपनी ओरैं ।
तुलसिदास अनुकूल जानि के, सियाजी हँसीं मुख मोरैं ॥५॥
॥ विनय ॥
(१)
काहे तैं हरि मोहिं बिसारो ।
जानत निज महिमा मेरे अघ, तदपि न नाथ सम्हारो ॥१॥
पतित-पुनीत दीनहित, असरण-सरण कहत श्रुति चारो ।
हौं नहिं अधम सभीत दीन, किधौं वेदन मृषा पुकारो ॥२॥
खग गणिका गज ब्याध पाँति जहँ, तहँ हौं हूँ बैठारो ।
अब केहि लाज कृपानिधान, परसत पनवारा फारो ॥३॥
- शब्द १ विनय के अर्थ—हे हरि मुझ को क्यों भूले जाते हो, तुम तो अपनी बड़ाई
और मेरे दोष दोनों को जानते हो फिर मुझे क्यों नहीं सम्हालते। चारो वेद आप
के पतितपावन, दुखिया के हितकारी, असरन की सरन होने की महिमा गाते हैं
फिर जो आप मुझ सरीखे अधम, संसारी भय मानने वाले और अव्वल दुखिया के