संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ गुसाईं तुलसीदासजी
ब्रह्म तू हौं जीव हौं, तू ठाकुर हौं चेरो ।
तात मात गुरु सखा तू, सब बिधि हित मेरो ॥ ३ ॥
तोहि मोहिं नातो अनेक, मानिये जो भावै ।
ज्यौँ त्यौँ तुलसी, कृपालु चरन सरन पावै ॥ ४ ॥
(५)
हरि जू मेरो मन हठ न तजै ।
निसि दिन नाथ देउँ सिख बहु बिधि, करत सुभाव निजै ॥१
ज्यौँ जुवती अनुभवत प्रसव¹ अति, दारुन दुख उपजै ।
ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ, पुनि खल पतिहिँ भजै ॥२॥
लोलुप भ्रमत श्रमित निसि बासर, सिर पदत्रान बजै ।
तदपि अधम बिचरत तेहिँ मारग, कबहूँ न मूढ़ लजै ॥३॥²
हौं हार्यो करि जतन विविधि बिधि, अतिसय प्रबल अजै³ ।
तुलसिदास बस होत तबै, जन प्रेरक प्रभु बरजै ॥ ४ ॥
(६)
दीन को दयालु दानि दूसरो न कोई ।
जाहि दीनता कहौँ हौं दीन देखौँ सोई⁴ ॥ १ ॥
मुनि सुर नर नाग असुर साहिब तै घनेरे ।
पै तै। लौं जौ लौं रावरे न नेकु नैन फेरे⁵ ॥ २ ॥
त्रिभुवन तिहुँ काल बिदित बदत⁶ बेद चारी ।
आदि अंत मध्य राम साहिबी तिहारी ॥ ३ ॥
(१) जनने का दुख सहती है। (२) जैसे लालची रात दिन रुपया कमाने के फेर
में थक जाता है और जूतियाँ खाता है फिर भी वही चाल चलता है और लाज
नहीं लाता । (३) अजीत । (४) ईश्वर को छोड़ दूसरा दीनता छुड़ाने का समर्थ
नहीं है, जिस किसी से अपनी दीनता का दुख रोता हूँ उसी को आप दीन
दुखी अर्थात असमर्थ पाता हूँ । (५) सुर नर मुनि आदि की जभी तक प्रभुता
है जब तक तेरो भौं उनकी ओर टेढ़ी नहीं होती । (६) कहता है ।