संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
५२ गुरु नानक
॥ साध महिमा ॥
जो नर दुख मैं दुख नहिं मानै ।
सुख सनेह अरु भय नहिं जा के, कंचन माटी जानै ॥१॥
नहिं निन्दा नहिं अस्तुति जा के, लोभ मोह अभिमाना ।
हर्ष सोक तैं रहै नियारा, नाहिं मान अपमाना ॥२॥
आसा मनसा सकल त्यागि कै, जग तैं रहै निरासा ।
काम क्रोध जेहिं परसै नाहिन, तेहिं घट ब्रह्म निवासा ॥३॥
गुरु किरपा जेहिं नर पै कीन्ही, तिन यह जुगति पिछानी ।
नानक लीन भयो गोबिंद सौं, ज्यौं पानी सँग पानी ॥४॥
॥ उपदेश ॥
(१)
जा मैं भजन राम को नाहीं ।
तेहि नर जनम अकारथ खोयो, यह राखो मन माहीं ॥१।
तीरथ करै बर्त पुनि राखै, नहिं मनुवाँ बस जा को ।
निष्फल धर्म ताहि तुम मानो, साच कहत मैं या को ॥२॥
जैसे पाहन जल मैं राख्यो, भेदै नहिं तेहि पानी ।
तैसेही तुम ताहि पिछानो, भगतिहीन जो प्रानी ॥३॥
कलि मैं मुक्ति नाम तैं पावत, गुरु यह भेद बतावै ।
कहु नानक सोई नर गरुवा, जो प्रभ के गुन गावै ॥४॥
(२)
साधो मन का मान तियागो ।
काम क्रोध संगत दुर्जन को, तातैं अहि निसि भागो ॥१॥
सुख दुख दोनोँ सम कर जानै, और मान अपमाना ।
हर्ष सोक तैं रहै अतीता, तिन जग तत्व पिछानां ॥२॥
अस्तुति निंदा दोऊ त्यागै, खोजै पद निरबाना ।
जन नानक यह खेल कठिन है, किनहूँ गुरमुख जाना ॥३
शब्द संग्रह ५३
(३)
यह मन नेक न कह्यो करै ।
सीख सिखाय रह्यो अपनी सी, दुरमति तैं न टरै ॥१॥
मद माया बस भयो बावरो, हरिजस नहिँ उचरै ।
करि परपंच जगत को डहकै, अपनो उदर भरै ॥ २ ॥
स्वान पूँछ ज्यौँ होय न सूधो, कह्यो न कान धरै ।
कहु नानक भजु राम नाम नित, जा तैँ काज सरै ॥३॥
(४)
माई मैं मन को मान न त्यागो ।
माया के मद जनम सिरायो, राम भजन नहिँ लाग्यो ॥१॥
जम को दंड पर्यो सिर ऊपर, तब सोवत तैँ जाग्यो ।
कहा होत अब के पछिताये, छूटत नाहिन भाग्यो ॥ २ ॥
यह चिंता उपजी घट मैं जब, गुरु चरनन अनुरांग्यो ।
सुफल जनम नानक तब हूआ, जो प्रभु जस मैं पाग्यो ॥३॥
(५)
मन की मनहीँ माहिँ रही ।
ना हरि भजे न तीरथ सेवे, चोटी काल गही ॥ १ ॥
दारा मीत पूत रथ संपति, धन जन पूर्न मही ।
और सकल मिथ्या यह जानो, भजन राम सही ॥ २ ॥
फिरत फिरत बहुते जुग हार्यो, मानस देह लही ।
नानक कहत मिलन की बिरिया, सुमिरत कहा१ नहीं ॥३॥
(६)
मन मूरख काहे बिल्लावै, पूर्व लिखे का लेखा पावै ॥१॥
दुक्ख सुक्ख प्रब देवनहार, अवर त्यागि तूँ तिसै चितार ॥२
जो कछु करै सोई सुख मान, भूला काहे फिरै अयान ॥३॥
(१) क्यों।
५४ गुरु नानक
कौन बस्तु आई तेरे संग, लपट रह्यो रस लोभि ५. ॥४
राम नाम जप हिरदे माहीं, नानक पत सेती घर जाही ॥५
(७)
रे मन कौन गति होइ है तेरी ॥ टेक ॥
एहि जग मैं राम नाम, सो तो नहिँ सुन्यो कान ।
विषयन सौँ अति लुभान, मति नाहिन फेरी ॥ १ ॥
मानस को जलम लीन्ह, सिमरन नहिँ निमिष कीन्ह ।
दारा सुत भयो दीन, पगहुँ परी बेरी ॥ २ ॥
नानक जन कह पुकार, सुपने ज्यौँ जग पसार ।
सिमरत नहिँ क्यौँ मुरार, माया जा की चेरी ॥ ३ ॥
(८)
साधो रचना राम बनाई ।
इक बिनसै इक इसिथर मानै, अचरज लख्यौ न जाई ॥१॥
काम क्रोध मोह बस, प्रानी, हरि मूरति बिसराई ।
झूठा तन साचा करि मान्यो, ज्यौँ सुपना रैनाई ॥२॥
जो दीसै सो सकल बिनासै, ज्यौँ बादर की छाँई ।
जन नानक जग जानौ मिथ्या, रहौ राम सरनाई ॥३॥
सूरदासजी
जीवन समय—अनुमान १५४० से १६०० तक। जनम स्थान—सीहो गाँव
दिल्ली के पास। जाति और आश्रम—सारस्वत ब्राह्मण, भेप। गुरू—वल्लभाचार्य्य
महाप्रभु।
यह एक गहरे कृष्णभक्त और साध शिरोमणि १६ वें शतक में हुए जो ३१ बरस
तक गु० तुलसीदासजी के समकालीन थे। इन को उद्धवजी का अवतार कहते
हैं और यह बाल-साध थे। आठ बरस की अवस्था में अपने माता पिता के
साथ मथुरा को गये और फिर वहीं एक साधू के पास रह गये। मथुरा से वह
गऊघाट आये जो आगरा और मथुरा के बीच में है, यहाँ वल्लभाचार्य्य महाप्रभु
के शिष्य हुए और उन के साथ श्रीनाथद्वारा को गये और वहीं रह कर अस्सी
बरस की अवस्था में शरीर त्याग किया। बीच २ में और स्थानों की भी यात्रा
करते रहे और एक रमत में गु० तुलसीदासजी से मेला हुआ और कुछ दिनों
तक दोनों का संग रहा। कितने लोग इन को जन्म का अंधा बतलाते हैं परंतु
इन की कविता की अनेक दृष्टान्तों और वर्णनों से जान पड़ता है कि पीछे से
उन की आँखें गईं। कहते हैं कि एक बार एक सुंदरी स्त्री को देख कर वह मोह
गये जिस पर उन्हें ऐसी ग्लानि आई कि अपनी आँखों का दोष समझकर उन
को फोड़ डाला। सूरदास जी ने तीन ग्रंथ रचे-सूरसागर, सूरावली और साहित्य-
लहरी (दृष्टकूट)। कृष्णभक्तों का विश्वास है कि इन्हों ने प्रण किया था कि
सवालाख पद लिखेंगे परंतु केवल ७५००० तक बनाये थे कि चोला छूट गया
फिर इन के पीछे श्रीकृष्ण ने आप अपने भक्त के बचन का पालन करने को शेष
५०००० बनाकर सवालाख की संख्या पूरी करदी, इन पदों में सूरश्याम की
छाप है। शरीर त्यागते समय आप ने प्रेम में गद्गद हो कर यह पद कहा था—
“खंजन नैन रूप रस माते।
अतिसै चारु चपल अनियारे, पल पिंजरा न समाते।
चलि चलि जात निकट स्रवनन के, उलटि उलटि तटंक१ फँदाते॥
सूरदास अंजन गुन अटके, नातरु अब उड़ि जाते॥”
(१) तटंक=नदी का किनारा, तड़ाक=तालाब।
५६ सूरदासजी
॥ चितावनी ॥
(१)
रे मन जन्म पदारथ जात ।
बिछुरे मिलन बहुरि कब ह्वै है, ज्यौँ तरवर के पात ॥१॥
सन्नपात कफ कंठ बिरोधी, रसना टूटी बात ।
प्रान लिये जम जात मूढ़ मति, देखत जननी तात ॥२॥
छिन इक माहिँ कोटि जुग बीतत, पीछे नर्क की बात ।
यह जग प्रीति सुआ सेमर की, चाखत ही उड़ि जात ॥३॥
जम के फंद नहीं पडु बौरै, चरनन चित्त लगाय ।
कहत सूर बिरथा यह दैही, अंनर कयौँ ऽ रात ॥४॥
(२)
जा दिन मन पंछी उड़ि जैहैँ ।
ता दिन तेरे तन तरुवर के, सबै पात झरि जैहैँ ॥ १ ॥
घर के कहैँ बेग ही काढो, भूत भये कोउ खैहैँ ।
जा प्रीतम से प्रीति घनेरी, सोऊ देखि डरैहैँ ॥ २ ॥
शब्द संग्रह ५७
॥ विरह ॥
(१)
अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी ।
देख्यो चाहत कमल नैन को, निसि दिन रहत उदासी ॥१॥
केसर तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन के बासी ।
नेह लगाय त्यागि गये तृन सम, डारि गये गल फाँसी ॥२॥
काहू के मन की को जानत, लोगन के मन हाँसी ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिन, लेहैं करवत कासी ॥३॥
(२)
बिन गोपाल बैरन भईं कुंजैं ॥ टेक ॥
तब ये लता लगत अति सीतल,
अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं१ ॥ १ ॥
वृथा बहत जमुना खग बोलत,
वृथा कमल फूलत अलि२ गुंजैं ॥ २ ॥
सूरदास प्रभु को मग जोवत,
अँखियाँ भईं अरुन३ ज्यों गुंजैं४ ॥ ३ ॥
(३)
निसि दिन बरसत नैन हमारे ।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जब से स्याम सिधारे ॥१॥
अंजन थिर न रहत अँखियन मैं, कर कपोल भये कारे ।
कंचुकि५ पट सूखत नहिँ कबहूँ, उर बिच बहत पनारे ॥२॥
आँसू सलिल६ भये पग थाके, बहे जात सित७ तारे ।
सूरदास अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे ॥३॥
(१) समूह । (२) भौंरा । (३) लाल । (४) घुँघची । (५) चोली । (६) नदी ।
(७) बँधे या जड़े हुए ।
८
५८ सूरदासजी
(४)
हरि के सँग मैं क्यों न गई री ॥ टेक ॥
हरि सँग जाती कंचन बन आती,
अब माटी के मोल भई री ॥ १ ॥
बरज्यो न कोई इन दूतिन को,
जाती बेर मोहिँ रोक लई री ॥ २ ॥
हरि विछुरन इक मरन हमारा,
नई दासी सँग प्रीति भई री ॥ ३ ॥
छल गयो कान्ह बहुरि नहिँ आयो,
अपने हाथ से मैं बिदा दई री ॥ ४ ॥
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को,
पिछली प्रीति अब नई भई री ॥ ५ ॥
(५)
राग बिलावल
ऊधो इतनी कहियो जाय ।
अति कृस-गात१ भई हैं तुम बिन, बहुत दुखारी गाथ ॥१॥
जल समूह बरसत अँखियन तैं, हूँकत लै लै नाँव ।
जहाँ जहाँ गउ दोहन करते, ढूँढ़त सोइ सोइ ठाँव ॥२॥
परत पछार खाय तेही छिन, अति ब्याकुल ह्वै दीन ।
मानो सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैं मीन ॥३॥
(६)
होली
सखी री मोहन मुसकाने, लागी सोई पै जाने ॥टेक॥
रात मोहन सुपने मैं देखे, सिथिल भये मोरे प्राने ।
बिरहा हूक लगी पसुरी मैं, नैन नीर बरसाने,
सखी जिउरा घबराने ॥ १ ॥
(१) दुबला ।
शब्द संग्रह ५६
हौं जो चढ़ी थी अपनी अटा पर, वह झट निकस्यो आने
मंद हँसन मुख देखि कृस्न को, क्या हौं कहौँ बखाने,
सखी कोइ पीर न जाने ॥२॥
हौं घायल मिरगी ज्यौं घूमत, परी धरनि पर आने ।
मंत्र जंत्र औषधि घिस लाये, बिसरे सभी¹ उपाव,
सखी कोइ लोग सियाने ॥३॥
और उपाव नहीं कोउ दूजो, स्याम मिलावो आने ।
जानत हैं पिय पीर हमारी, सूरदास के प्रान,
सखी कोइ और न जाने ॥ ४ ॥
(७)
होली
साँवरे सौं कहियो मोरी ॥ टेक ॥
सीस नवाय चरन गहि लीजो, करि बिनती कर जोरी
ऐसी चूक कहा परी मो सौं, प्रीति पाछली तोरी,
सुरति ना लीन्हि बहोरी ॥ १ ॥
भूषन बसन सभी तजि दीन्हे, खान पान बिसरो री ।
बिभुति रमाय जोगिन ह्वै बैठौं, तेरो ही ध्यान धरो री,
अब मैं कैसी करौँ री ॥ २ ॥
निसि दिन ब्याकुल फिरत राधिका, बिरह बिधा तन घेरी ।
बारि² करेजा जारि दियो है, अब मैं कैसी करौँ री ।
बेग चलि आवो किसोरी ॥ ३ ॥
रोम रोम बिष छाय रह्यो है, मधु मेरे बैर परो री ।
स्याम तुम्हें ढूँढ़त कुंजन में, सीस लटा गहि झोरी,
कहौँ हरि हो हरि हो री ॥ ४ ॥
(१) सब लोग । (२) बाल अवस्था का अर्थात कोमल ।
६० सूरदासजी
जा दिन गमन किये मथुरा में, गोपिन सुधि बिसरे री।
हम को जोग भोग कुबजा को, का तकसीर है मोरी,
कहा कछु कीन्ही चोरी ॥ ५ ॥
सूरदास प्रभु सौँ जा कहियो, आवै अवधि रही थोरी।
प्रान दान दीजो नँद नन्दन, गावत कीरति तोरी।
प्रीति अब कीजै बहोरी ॥ ६ ॥
(८)
कुब्जा ने जादू डारा, जिन मोह्यो स्याम हमारा री ॥टेक
निसि दिन चलत रहत नहिं राखै, इन नैनन जलधारा री ॥१
अब यह प्रान कैसे हम राखैं, बिछुरे प्रान-अधारा री ॥२॥
ऊधो तब तैं कलन परत है, जब तैं स्याम सिधारा री ॥३॥
अब तो मधुबन जाय ले आवो, सुन्दर नन्द दुलारा री ॥४॥
सूरदास प्रभु आन मिलावो, तन मन धन सब वारा री ॥५॥
॥ प्रेम ॥
(१)
नाहिँन रह्यो मन में ठौर।
नन्द नन्दन अछत¹ कैसे, आनिये उर और ॥ १ ॥
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत रात।
हृदय तैं वह स्याम मूरत, छिन न इत उत जात ॥ २ ॥
कहत कथा अनेक ऊधो, लोक लाज दिखाव।
कहा करौँ तन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समात ॥ ३ ॥
स्याम गात सरोज आनन², ललित गति मृदु हाँस।
सूर ऐसे रूप कारन, मरत लोचन प्यास ॥ ४ ॥
(२)
या ऋतु रूस रहन की नाहीँ।
बरसत मेघ मेदिनी के हितु, प्रीतम हरष बढ़ाहीँ ॥ १ ॥
(१) के होते। (२) कमल जैसा मुख।
शब्द संग्रह ६१
जे बेली ग्रीषम ऋतु जरहीं, ते तरवर लपटाहीं ।
उमड़ी नदी प्रेम रस छाती, सिंधु मिलन को जाहीं ॥२॥
यह संपदा दिवस चारक की, सोच समझ मन माहीं ।
सूर सुनत उठि चली राधिका, दै दूती गल बाहीं ॥३॥
(३)
भींजत कुंजन से दोउ आवत ।
ज्यौँ ज्यौँ बूँद परत चूनर पर, त्यौँ त्यौँ हरि उर लावत ॥१॥
अधिक झकोर होत मेघन की, द्रुम तर छिन बिलमावत ।
वे हँसि ओट करत पीतांबर, वे चूनरहिँ उढ़ावत ॥२॥
तैसेहिँ मोर कोकिला बोलत, पवन बीच घन धावत ।
ले मुरली कर मन्द घोर स्वर, राग मलार बजावत ॥३॥
भींजे राग रागिनी दोऊ, भींजे तन छवि पावत ।
सूरदास हरि मिलत परस्पर, प्रीति अधिक उपजावत ॥४॥
(४)
आज हौँ एक को ले कै टरि हौँ ।
मोहिँ कहा डरपावत हौ प्रभु, अपने पूरे¹ परिलरिहौँ ॥१॥
हौँ तो पतित सात पीढ़ी को, जो जिय ऐसी धरिहौँ ।
हौँ तो फिरि वैसो ही ह्वै हौँ, तुमहिँ बिरद बिनु करिहौँ ॥२॥
अब तो तुम परतीत नसाई, क्यों मानै मम हियरा ।
सूरदास साची तब थपिहौँ, जब हँसि दै हौ बीरा ॥३॥
(५)
अब तौ प्रगट भई जग जानी ।
वा मोहन सों प्रीति निरंतर, क्यौं निबहैगो छानो² ॥१॥
कहा करौँ सुंदर मूरति इन, नैनन माँझि समानी ।
निकसत नाहिँ बहुत पचि हारी, रोम रोम अरुझानी ॥२॥
(१) पूरा यानी खानदानी, सात पीढ़ी का पतित—देखो आगे की कड़ी ।
(२) छिपी हुई ।
६२ सूरदासजी
अब कैसे निर्वारि१ जात है, 'मिले दुग्ध ज्यौं पानी
सूरदास प्रभु अंतरजामी, उर अंतर की जानी ॥ ३ ॥
(६)
नेक नहीं मन घर सौं लागत ।
पिता मात गुरुजन परबोधत२,
नीके बचन बान सम लागत ॥ १ ॥
तिन को धृग धृग कहति मनहिँ मन,
इन कौं बनै भले ही त्यागत ।
स्याम-विमुख नर नारि वृथा सब,
कैसे मन इन सौं अनुरागत ॥ २ ॥
इन को बदन३ प्रात दरखो जिनि,
बार बार बिधि४ सौं यह माँगत ,
यह तन सूर स्याम को अर्ध्यो,
नेक टरत नहिँ सोवत जागत ॥ ३ ॥
॥ विनय ॥
(१)
तुम मेरी राखो लाज हरी ।
तुम जानत सब अन्तरजामी, करनी कछु न करी ॥१॥
औगुन मोसे बिसरत नाहीं, पल छिन घरी घरी ।
सब प्रपंच की पोट बाँध करि, अपने सीस घरी ॥२॥
दारा सुत धन मोह लिये हौं, सुधि बुधि सब बिसरी ।
सूर पतित को बेग उधारो, अब मेरी नाव भरी ॥३॥
(२)
हमारे प्रभु औगुन चित न धरो ।
सम-दरसी है नाम तिहारो, अब मोहिँ पार करो ॥१॥
(१) सुलझाई या अलग की जा सकती है। (२) समझाते हैं। (३) मुँह ।
(४) ब्रह्मा ।
शब्द संग्रह ६३
इक नदिया इक नार१ कहावत, मैलो नीर भरो ।
जब दोनोँ मिलि एक बरन भये, सुरसरि नाम परो ॥२॥
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परो ।
पारस गुन अवगुन नहिं चितवै, कंचन करत खरो ॥३॥
यह माया भ्रम जाल निवारो, सूरदास सगरो ।
अबकी बेर मोहिँ पार उतारो, नहिँ प्रन जात टरो ॥४॥
(३)
हरि हौँ बड़ी बेर को ठाढ़ो ।
जैसे और पतित तुम तारे, तिनहीँ मैं लिखि काढ़ो ॥१॥
जुग जुग बिरद यही चलि आयो, टेर कहत हौँ ता तैँ ।
मरियत लाज पंच पतितन मैं, हौँ घट कहो कहाँ तैँ ॥२॥
कै अब हार मान करि बैठो, कै कर बिरद सही ।
सूर पतित जो झूठ कहत है, देखो खोलि बही ॥ ३ ॥
(४)
अबकी राखि लेहु भगवान ।
हम अनाथ बैठौ द्रुम डरियाँ, पारधि२ साध्यो बान ॥१॥
ता के डर निकसन चाहत हौँ, उपर रह्यो सचान३ ।
दोऊ भाँति दुख भयो कृपानिधि, कौन उबारै प्रान ॥२॥
सुमिरत ही अहि४ डस्यो पारधी, लाग्यो तोर सचान३।
सूरदास गुन कहँ लग बरनौँ, जै जै कृपानिधान ॥३॥
(५)
जो जन ऊधो मोहिँ न बिसारै,
तेहि न बिसारौँ छिन एक घरी ॥टेक॥
जो मोहिँ भजै भजौँ मैं वा को, कल न परत मोहिँ एक घरी।
काटौँ जनम जनम के फंदा, राखौँ सुख आनन्द करी ॥ १॥
(१) नाला । (२) शिकारी । (३) बाज़ । (४) साँप ।
६४ सूरदासजी
चतुर सुजान सभा मैं बैठे, दुःसासन अनरीति क ॰ ।
सुमिरन कियो द्रोपदी जबहीँ, खैँचत चीर उबारि ध ॥२
ध्रुव प्रहलाद रैनि दिन ध्यावै, प्रगट भये बैकुंठ पुरी ।
भारत मैं अरुही के अंडा, ता पर गज को घंट ढुरी ॥३॥
अंबरीष गृह आये दुर्बासा, चक्र सुदर्सन छाँहि करी१ ।
सूर के स्वामी गजराज उबारे, कृपा करी जगदीस हरी ॥४॥
(६)
दीनानाथ अब बार तुम्हारी ।
पतित-उधारन विरद२ जानि के, विगरी लेहु सँवारी ॥१॥
बालापन खेलत ही खोयो, जुवा विषय रस माते ।
वृद्ध भये सुधि प्रगटी मो को, दुखित पुकारत ता तैँ ॥२॥
सुतन्ह तज्यो त्रिय भ्रात तज्यो सब, तन तैँ त्वचा भइ न्यारी ।
स्रवन न सुनत चरन गति थाकी, नैन बहे जल धारी ॥३॥
पलित३ केस कफ कण्ठ अब रूंध्यो४, कल न परै दिन राती।
माया मोह न छाड़ै तृस्ना, यह दोऊ दुखदाती ॥ ४ ॥
अब यह व्यथा दूर करिये को, और न समरथ कोई ।
सूरदास प्रभु करुना-सागर, तुम तैँ होय सो होई ॥ ५ ॥
(७)
नाथ मोहिँ अबकी बेर उबारो ॥ टेक ॥
तुम नाथन के नाथ सुवामी, दाता नाम तिहारो ।
करमहीन जनम को अंधो, मो तैँ कौन नकारो ॥ १ ॥
(१) कथा है कि परम भक्त राजा अंबरीष को बिना अपराध दुर्बासा ऋषि
ने शाप देना चाहा जिस पर विष्णु के सुदर्शन चक्र ने दुर्बासा को खदेरा । मुनि
जी भागते २ विष्णु की शरण में पहुँचे पर उन्होंने अपने भक्त के अपराधी की
रक्षा करने मैं अपनी असमर्थ्यता प्रगट की और अंत को राजा अंबरीष के
शरणागत होने पर वह बचे । (२) प्रण । (३) पके । (४) घरघराना ।
शब्द संग्रह ६५
तीन लोक के तुम प्रति-पालक, मैं तो दास तिहारो ।
तारी जाति कुजाति प्रभू जी, मो पर किरपा धारो ॥२॥
पतितन मैं इक नायक कहिये, नीचन मैं सरदारी ।
कोटि पापी इक पासँग मेरे, अजामिल कौन बिचारी ॥३॥
नाठो धरम नाम सुनि मेरो, नरक कियो हठ तारो ।१
मो को ठौर नहीं अब कोऊ, अपनो बिरद सम्हारी ॥४॥
छुद्र पतित तुम तारे रमापति, अब न करो जियगारो ।
सूरदास साचो तब माने, जो ह्वै मम निस्तारो ॥ ५ ॥
(८)
चूक परी मो तैं मैं जानी, मिलैं स्याम बकसाऊँ री ।
हा हा करि दसननि तृन धरिधरि, लोचन जलनि ढराऊँ री२ १
चरन गहौँ गाढ़े करि कर सौँ, पुनि पुनि सीस छुआऊँ री ।
मुख चितऊँ फिरि धरनि निहारौँ, ऐसे रुचि उपजाऊँ री ॥२
मिलैँ धाय अकुलाय भुजनि भरि, उर की तपनि जनाऊँ री ।
सूरस्याम अपराध छमहु अब, यह कहि कहि जु सुनाऊँ री ३
(९)
माधो जू जो जन तैं बिगरै ।
सुन कृपालु करुनामय कबहुँ, प्रभु नहिँ चित्त धरै ॥ १ ॥
ज्यौँ सिसु३ जननि४ जठर५ अंतरगत, सत अपराध करै ।
तऊ तनय६ तनु तोष पोष चित, बिहँसत अंक भरै ॥२॥
जदपि बिटप७ जर हतन८ हेत करि, कर कुठार पकरै ।
तदपि सुभाव सुसील सुसीतल, रिपु तनु ताप हरै ॥३॥
(१) धर्मराय ने मेरा नाम सुनकर मुझे ग्रहण करने से इनकार किया और
नर्क बोला कि हमारे यहाँ रहने के यह योग्य नहीं है-इस को तार कर हटाओ ।
(२) दाँतों के नीचे तिनका धर कर (जोकि निशान आधीनता का है) आँखों से
जल धारा वहाती हूँ । (३) बालक । (४) माता । (५) पेट । (६) बेटा । (७) पेड़ ।
(८) काटने के लिये ।
६
६६ सूरदासजी
कारन करन अनन्त अजित कहँ, केहिँ विधि चरन रै ।
यह कलिकाल चलत नहिं मो पै, सूर सरन उबरै ॥ ॥
(१०)
अब हैँ नाच्यो बहुत गोपाल ॥ टेक ॥
काम क्रोध को पहिरि चोलना, कंठ बिषय की माल ।
महा मोह के नूपुर बाजत, निन्दा सबद रसाल ॥ १ ॥
तृस्ना नाद करत घट भीतर, नाना बिधि की ताल ।
माया को कटि१ फेटा बाँध्यो, लोभ तिलक दियो भाल२॥२
कोटिक कला नाच दिखराई, जल थल सुधि नहिँ काल ।
सूरदास की सभी अबिद्या, दूर करो नँदला॰ ॥ ३ ॥
(११)
मो सम कौन कुटिल खल कामी ।
जिन तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसा निमक-हरामी ॥१॥
भरि भरि उदर बिषय को धावौँ, जैसे सूकर ग्रामी३ ।
हरि-जन छाड़ हरि-बिमुखन की, निसिदिन करतगुलामी॥२
पापी कौन बड़ो है मो तैं, सब पतितन मैं नामी ।
सूर पतित को ठौर कहाँ है, सुनिये श्रीपति४ स्वामी ॥३॥
॥ उपदेश ॥
(१)
छाडु मन हरि बिमुखन को संग ।
कहा भयो पय पान कराये, विष नहिँ तजत भुवंग ॥१॥
जा के संग कुबुद्धी उपजै, परत भजन मैं भंग ।
काम क्रोध मद लोभ मोह मैँ, निस दिन रहत उमंग ॥२॥
कागहि कहा कपूर खवाये, स्वान न्हवाये गंग ।
खर को कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग ॥ ३ ॥
(१) कमर । (२) सिर । (३) गाँव का सुअर । (४) लक्ष्मी के पति अर्थात विष्णु ।
द्वितीय भाग: सन्त दादू दयाल, सुन्दरदास एवं रज्जब जी के पद
शब्द संग्रह ६७
पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीता¹ करत निषंग² ।
सूरदास खल कारी कामरि, चढ़त न दूजो रंग ॥ ४ ॥
(२)
सब दिन होत न एक समान ॥ टेक ॥
इक दिन राजा हरीचंद गृह, संपति मेरु समान ।
इक दिन जाय स्वपच गृह सेवत, अंचर हरत मसान ॥१॥
इक दिन दूलह बनत बराती, चहुँ दिसि गड़त निसान ।
इक दिन डेरा होत जँगल मैं, कर सूधे पग तान ॥२ ॥
इक दिन सीता रुदन करत है, महा विषम उद्यान³ ।
इक दिन रामचन्द्र मिलिदोऊ, विचरत पुष्प विमान ॥३॥
इक दिन राजा राज जुधिष्टिर, अनुचर श्रीभगवान ।
इक दिन द्रोपदि नग्न होत है, चीर दुसासन तान ॥४ ॥
प्रगटत है पूरब की करनी, तजु मन सोच अजान ।
सूरदास गुन कहँ लग वरनौँ, विधि के अंक⁴ प्रमान ॥५॥
स्वामी हरिदास
यह एक भारी कृष्ण भक्त हुए जो सोलहवें शतक के पिछले हिस्से से सत्रहवें
शतक के अगले हिस्से तक विराजमान थे। ललिता सखी के अवतार समझे
जाते हैं। गान विद्या मैं यह बड़े निपुन प्रसिद्ध तानसेन के गुरू थे। अकबर
वादशाह जो इन का समकालीन था एक वार तानसेन के साथ इन के दर्शन को
आया था। इन के कई एक ग्रंथ हैं जिन मैं से भरथरी-वैराग्य और रस के पद
प्रसिद्ध हैं। भरथरी-वैराग्य संबत १६०७ मैं और पद १६१७ मैं बनाये गये।
(१)
गायो न गोपाल मन लाइ के निवारि लाज ।
पायो न प्रसाद साधु मण्डली मैं जाइ के ॥ १ ॥
(१) ख़ाली । (२) तरकश । (३) भारी, जंगल मैं । (४) ब्रह्मा का कर्म्म लेख ।
६८ मीरा बाई
धायो न धमक वृन्दाविपिन की कुंजन मैं।
रह्यो न सरन जाइ - विठुलेसराइ के ॥ २ ॥
नाथ जू न देखि छक्यो छिनहूँ छबीली छाँव।
सिंह पौरि पर्यो नाहिं सीसहुँ नवाइ के ॥ ३ ॥
कहै हरिदास तोहिँ लाज हू न आवै नेक।
जनम गँवाये ना कमायो कछु आइ के ॥ ४ ॥
(२)
गहौ मन, सब रस को रस सार ॥ टेक ॥
लोक वेद कुल करमै तजिये, भजिये नित्य विहार ॥१॥
गृह कामिनि कंचन-धन त्यागो, सुमिरौ स्याम उदार ॥२
गहि हरिदास रीति सन्तन को, गादी को अधिकार ॥३॥
मीरा बाई
जीवन समय—१५७३ से १६३० तक। जन्म स्थान—मौ० कुकड़ी (मेरता.
मारवाड़)। जाति और आश्रम—राठोर, गृहस्थ। गुरू—रैदासजी।
इन की अनूठी भक्ति जग-प्रसिद्ध है। यह जोधपुर के राठोर राव रंजीतसिंह
की एकलौती बेटी थीं और उदयपुर के युवराज कुँवर भाजराज से ब्याही गईं
जो राजगद्दी पर बैठने के पहिले ही मर गये। पति के देहान्त होने पर मीरा बाई के
देवर ने जो गद्दी पर बैठे इन को निरंतर भक्ति और साधु सेवा करने के कारन
बहुत सताया यहाँ, तक कि बाई जी को घर से भाग जाना पड़ा। कहते हैं कि
मीरा बाई अंत समय द्वारका में रनछोर जी की मूर्त्ति में समा कर अलोप होगईँ।
॥ चितावनी ॥
(१)
मनखा¹ जनम पदारथ पायो, ऐसो बहुर न आती ॥टेक॥
अब के मोसर² ज्ञान बिचारो, राम राम मुख गाती।
सतगुर मिलिया सुंज³ पिछानी, ऐसा ब्रह्म मैं पाती ॥१॥
(१) मनुष्य का। (२) अवसर। (३) सूझ।
शब्द संग्रह ६६
सगुरा सूरा अमृत पीवे, निगुरा प्यासा जाती।
मगन भया मेरा मन सुख मैं, गौबिंद का गुन गाती ॥२॥
साहिब पाया आदि अनादी, नातर १ भव मैं जाती।
मीरा कहे इक आस आप की, ओराँ २ सँ सकुचाती ॥३॥
(२)
भज मन चरन कँवल अविनासी ॥ टेक ॥
जेताइ दीसै धरनि गगन बिच, तेताइ सब उठि जासी ।
कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे. कहा लिये करवत कासी ॥१
इस देही का गरब न करना, माटी मैं मिल जासी ।
यो संसार चहर ३ की बाजी, साँझ पद्याँ उठि जासी ॥२॥
कहा भयो है भगवा पहरुयाँ, घर तज भये सन्यासी ।
जोगी होय जुगति नहिं जानी, उलटि जनम फिर आसी ॥३
अरज करैँ अबला कर जोरे, स्याम तुम्हारी दासी ।
मीरा के प्रभु गिरधर नांगर, काटो जम की फाँसी ॥४॥
॥ विरह ॥
(१)
हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय ॥टेक॥
सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय ।
गगन मॅडल पै सेज पिया की, किस बिंध मिलना होय ॥१॥
घायल की गति घायल जानै, की जिन लाई होय ।
जौहरी को गत जौहरी जानै, की जिन जौहर होय ॥२॥
दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्या नहिं कोय ।
मीरा की प्रभु पीर मिटैगी, जब. वैद सँवलिया होय ॥३॥
(१) नहीं तो। (२) दूसरों। (३) चिड़ियों का सा तमाशा जो साँझ होते ही
बसेरे को उड़ जाती हैं।
७० मीरा बाई
(२)
नीँदलड़ी नहिँ आवै सारी रात, किस बिध होइ परभात¹॥टेक
चमक² उठी सपने सुध भूली, चंद्र कला न सुहात ।
तलफ तलफ जिव जाय हमारो, कब रे मिलै दोना-नाथ ॥
भइ हूँ दिवानी तनसुध भूली, कोई न जानी म्हाँरी बात ।
मीरा कहै बीती सोइ जानै, मरन जीवन उन हाथ ॥२॥
(३)
नैना म्हारे बान पड़ी, साँई मोहिँ दरस दिखाई ॥ टेक ॥
चित्त चढ़ी मेरे माधुरि मूरत, उर विच आन अड़ी ॥१॥
कैसे प्रान पिया बिनु राखूँ, जीवन मूर जड़ी³ ॥ २ ॥
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ, अपने भवन खड़ी ॥ ३ ॥
मीरा प्रभु के हाथ बिकानी, लोक कहै बिगड़ी ॥ ४ ॥
(४)
माई म्हाँरी हरि न बूझी बात ।
पिंड मैँ से प्राण पापी, निकस क्यूँ नहिँ जात ॥ १ ॥
रैन अँधेरी बिरह घेरी, तारा गिणत निस जात ।
ले कटारी कंठ चीरूँ, करूँगी अपघात ॥ २ ॥
पाट⁴ न खोल्या मुखाँ न बोल्या, साँझ लग परभात ।
अबोलना मैँ अवध बीती, काहे की कुसलात ॥ ३ ॥
सुपन मैँ हरि दरस दीन्हौँ, मैँ न जाग्यो हरि जात ।
नैन म्हाँरा उघड़⁵ आया, रही मन पछतात ॥ ४॥
आवन आवन होय रह्यो रे, नहिँ आवन की बात ।
मीरा ब्याकुल बिरहनी रे, बाल ज्यौँ बिल्लात ॥ ५ ॥
(५)
घड़ी एक नहिँ आवड़े⁶, तुम दरसन बिन मोय ।
तुम ही मेरे प्राण जी, का सूँ जीवन होय ॥ १ ॥
(१) सवेरा । (२) चौंक । (३) बूटी । (४) परदा । (५) खुल गया । (६) सुहावै ।
धान१ न भावै नींद न आवै, विरह सतावै मोय।
घायल सी घूमत फिरूँ रे, मेरा दरद न जाने कोय ॥२॥
दिवस तो खाय गमाइयो रे, रैन गमाई सोय।
प्राण गमायो झूरताँ२ रे, नैन गमाई रोय ॥ ३ ॥
जो मैं ऐसा जानती रे, प्रीत किये दुख होय।
नगर ढँढोरा फेरती रे, प्रीत करो मत कोय ॥ ४ ॥
पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ, ऊबी३ मारग जोय।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलियाँ सुख होय ॥५॥
(६)
मैं अपने सैयाँ सँग साची।
अब काहे की लाज सजनी, प्रगट ह्वै नाची ॥ १ ॥
दिवस भूख न चैन कबहिन, नींद निसु नासी।
बेध वार को पार होइगो, ज्ञान गुह४ गाँसी ॥ २ ॥
कुल कुटुँब सब आनि बैठे, जैसे मधु मासी५।
दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी ॥ ३ ॥
(७)
नातो६ नाम को मो सूँ, तनक न तोड़्यो जाय ॥ टेक ॥
पानाँ ज्यूँ पीली पड़ी रे, लोग कहै पिंड रोग।
छाने७ लाँघन८ मैं किया रे, राम मिलन के जोग ॥ १ ॥
बाबल९ बैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हाँरी बाँह१०।
मूरख बैद मरम नहिँ जाने, करक११ कलेजे माँह ॥ २॥
जाओ बैद घर आपने रे, म्हाँरो नाँव न लेय।
मैं तो दाधी१२ विरह की रे, काहे कूँ औषध१३ देय ॥ ३॥
शब्दार्थ / पाद-टिप्पणी:
(१) अन्न। (२) बिलक बिलक कर। (३) खड़ी। (४) गुप्त। (५) शहद की
मक्खी। (६) रिश्ता। (७) छिप कर। (८) फ़ाक़ा। (९) बाप। (१०) नाड़ी।
(११) दर्द। (१२) जली हुई। (१३) दवा।