संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६१
जे बेली ग्रीषम ऋतु जरहीं, ते तरवर लपटाहीं ।
उमड़ी नदी प्रेम रस छाती, सिंधु मिलन को जाहीं ॥२॥
यह संपदा दिवस चारक की, सोच समझ मन माहीं ।
सूर सुनत उठि चली राधिका, दै दूती गल बाहीं ॥३॥
(३)
भींजत कुंजन से दोउ आवत ।
ज्यौँ ज्यौँ बूँद परत चूनर पर, त्यौँ त्यौँ हरि उर लावत ॥१॥
अधिक झकोर होत मेघन की, द्रुम तर छिन बिलमावत ।
वे हँसि ओट करत पीतांबर, वे चूनरहिँ उढ़ावत ॥२॥
तैसेहिँ मोर कोकिला बोलत, पवन बीच घन धावत ।
ले मुरली कर मन्द घोर स्वर, राग मलार बजावत ॥३॥
भींजे राग रागिनी दोऊ, भींजे तन छवि पावत ।
सूरदास हरि मिलत परस्पर, प्रीति अधिक उपजावत ॥४॥
(४)
आज हौँ एक को ले कै टरि हौँ ।
मोहिँ कहा डरपावत हौ प्रभु, अपने पूरे¹ परिलरिहौँ ॥१॥
हौँ तो पतित सात पीढ़ी को, जो जिय ऐसी धरिहौँ ।
हौँ तो फिरि वैसो ही ह्वै हौँ, तुमहिँ बिरद बिनु करिहौँ ॥२॥
अब तो तुम परतीत नसाई, क्यों मानै मम हियरा ।
सूरदास साची तब थपिहौँ, जब हँसि दै हौ बीरा ॥३॥
(५)
अब तौ प्रगट भई जग जानी ।
वा मोहन सों प्रीति निरंतर, क्यौं निबहैगो छानो² ॥१॥
कहा करौँ सुंदर मूरति इन, नैनन माँझि समानी ।
निकसत नाहिँ बहुत पचि हारी, रोम रोम अरुझानी ॥२॥
(१) पूरा यानी खानदानी, सात पीढ़ी का पतित—देखो आगे की कड़ी ।
(२) छिपी हुई ।