संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ गुरु नानक
॥ साध महिमा ॥
जो नर दुख मैं दुख नहिं मानै ।
सुख सनेह अरु भय नहिं जा के, कंचन माटी जानै ॥१॥
नहिं निन्दा नहिं अस्तुति जा के, लोभ मोह अभिमाना ।
हर्ष सोक तैं रहै नियारा, नाहिं मान अपमाना ॥२॥
आसा मनसा सकल त्यागि कै, जग तैं रहै निरासा ।
काम क्रोध जेहिं परसै नाहिन, तेहिं घट ब्रह्म निवासा ॥३॥
गुरु किरपा जेहिं नर पै कीन्ही, तिन यह जुगति पिछानी ।
नानक लीन भयो गोबिंद सौं, ज्यौं पानी सँग पानी ॥४॥
॥ उपदेश ॥
(१)
जा मैं भजन राम को नाहीं ।
तेहि नर जनम अकारथ खोयो, यह राखो मन माहीं ॥१।
तीरथ करै बर्त पुनि राखै, नहिं मनुवाँ बस जा को ।
निष्फल धर्म ताहि तुम मानो, साच कहत मैं या को ॥२॥
जैसे पाहन जल मैं राख्यो, भेदै नहिं तेहि पानी ।
तैसेही तुम ताहि पिछानो, भगतिहीन जो प्रानी ॥३॥
कलि मैं मुक्ति नाम तैं पावत, गुरु यह भेद बतावै ।
कहु नानक सोई नर गरुवा, जो प्रभ के गुन गावै ॥४॥
(२)
साधो मन का मान तियागो ।
काम क्रोध संगत दुर्जन को, तातैं अहि निसि भागो ॥१॥
सुख दुख दोनोँ सम कर जानै, और मान अपमाना ।
हर्ष सोक तैं रहै अतीता, तिन जग तत्व पिछानां ॥२॥
अस्तुति निंदा दोऊ त्यागै, खोजै पद निरबाना ।
जन नानक यह खेल कठिन है, किनहूँ गुरमुख जाना ॥३