संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूरदासजी
जीवन समय—अनुमान १५४० से १६०० तक। जनम स्थान—सीहो गाँव
दिल्ली के पास। जाति और आश्रम—सारस्वत ब्राह्मण, भेप। गुरू—वल्लभाचार्य्य
महाप्रभु।
यह एक गहरे कृष्णभक्त और साध शिरोमणि १६ वें शतक में हुए जो ३१ बरस
तक गु० तुलसीदासजी के समकालीन थे। इन को उद्धवजी का अवतार कहते
हैं और यह बाल-साध थे। आठ बरस की अवस्था में अपने माता पिता के
साथ मथुरा को गये और फिर वहीं एक साधू के पास रह गये। मथुरा से वह
गऊघाट आये जो आगरा और मथुरा के बीच में है, यहाँ वल्लभाचार्य्य महाप्रभु
के शिष्य हुए और उन के साथ श्रीनाथद्वारा को गये और वहीं रह कर अस्सी
बरस की अवस्था में शरीर त्याग किया। बीच २ में और स्थानों की भी यात्रा
करते रहे और एक रमत में गु० तुलसीदासजी से मेला हुआ और कुछ दिनों
तक दोनों का संग रहा। कितने लोग इन को जन्म का अंधा बतलाते हैं परंतु
इन की कविता की अनेक दृष्टान्तों और वर्णनों से जान पड़ता है कि पीछे से
उन की आँखें गईं। कहते हैं कि एक बार एक सुंदरी स्त्री को देख कर वह मोह
गये जिस पर उन्हें ऐसी ग्लानि आई कि अपनी आँखों का दोष समझकर उन
को फोड़ डाला। सूरदास जी ने तीन ग्रंथ रचे-सूरसागर, सूरावली और साहित्य-
लहरी (दृष्टकूट)। कृष्णभक्तों का विश्वास है कि इन्हों ने प्रण किया था कि
सवालाख पद लिखेंगे परंतु केवल ७५००० तक बनाये थे कि चोला छूट गया
फिर इन के पीछे श्रीकृष्ण ने आप अपने भक्त के बचन का पालन करने को शेष
५०००० बनाकर सवालाख की संख्या पूरी करदी, इन पदों में सूरश्याम की
छाप है। शरीर त्यागते समय आप ने प्रेम में गद्गद हो कर यह पद कहा था—
“खंजन नैन रूप रस माते।
अतिसै चारु चपल अनियारे, पल पिंजरा न समाते।
चलि चलि जात निकट स्रवनन के, उलटि उलटि तटंक१ फँदाते॥
सूरदास अंजन गुन अटके, नातरु अब उड़ि जाते॥”
(१) तटंक=नदी का किनारा, तड़ाक=तालाब।