संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ६३
इक नदिया इक नार१ कहावत, मैलो नीर भरो ।
जब दोनोँ मिलि एक बरन भये, सुरसरि नाम परो ॥२॥
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परो ।
पारस गुन अवगुन नहिं चितवै, कंचन करत खरो ॥३॥
यह माया भ्रम जाल निवारो, सूरदास सगरो ।
अबकी बेर मोहिँ पार उतारो, नहिँ प्रन जात टरो ॥४॥
(३)
हरि हौँ बड़ी बेर को ठाढ़ो ।
जैसे और पतित तुम तारे, तिनहीँ मैं लिखि काढ़ो ॥१॥
जुग जुग बिरद यही चलि आयो, टेर कहत हौँ ता तैँ ।
मरियत लाज पंच पतितन मैं, हौँ घट कहो कहाँ तैँ ॥२॥
कै अब हार मान करि बैठो, कै कर बिरद सही ।
सूर पतित जो झूठ कहत है, देखो खोलि बही ॥ ३ ॥
(४)
अबकी राखि लेहु भगवान ।
हम अनाथ बैठौ द्रुम डरियाँ, पारधि२ साध्यो बान ॥१॥
ता के डर निकसन चाहत हौँ, उपर रह्यो सचान३ ।
दोऊ भाँति दुख भयो कृपानिधि, कौन उबारै प्रान ॥२॥
सुमिरत ही अहि४ डस्यो पारधी, लाग्यो तोर सचान३।
सूरदास गुन कहँ लग बरनौँ, जै जै कृपानिधान ॥३॥
(५)
जो जन ऊधो मोहिँ न बिसारै,
तेहि न बिसारौँ छिन एक घरी ॥टेक॥
जो मोहिँ भजै भजौँ मैं वा को, कल न परत मोहिँ एक घरी।
काटौँ जनम जनम के फंदा, राखौँ सुख आनन्द करी ॥ १॥
(१) नाला । (२) शिकारी । (३) बाज़ । (४) साँप ।