संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द संग्रह ५३
(३)
यह मन नेक न कह्यो करै ।
सीख सिखाय रह्यो अपनी सी, दुरमति तैं न टरै ॥१॥
मद माया बस भयो बावरो, हरिजस नहिँ उचरै ।
करि परपंच जगत को डहकै, अपनो उदर भरै ॥ २ ॥
स्वान पूँछ ज्यौँ होय न सूधो, कह्यो न कान धरै ।
कहु नानक भजु राम नाम नित, जा तैँ काज सरै ॥३॥
(४)
माई मैं मन को मान न त्यागो ।
माया के मद जनम सिरायो, राम भजन नहिँ लाग्यो ॥१॥
जम को दंड पर्यो सिर ऊपर, तब सोवत तैँ जाग्यो ।
कहा होत अब के पछिताये, छूटत नाहिन भाग्यो ॥ २ ॥
यह चिंता उपजी घट मैं जब, गुरु चरनन अनुरांग्यो ।
सुफल जनम नानक तब हूआ, जो प्रभु जस मैं पाग्यो ॥३॥
(५)
मन की मनहीँ माहिँ रही ।
ना हरि भजे न तीरथ सेवे, चोटी काल गही ॥ १ ॥
दारा मीत पूत रथ संपति, धन जन पूर्न मही ।
और सकल मिथ्या यह जानो, भजन राम सही ॥ २ ॥
फिरत फिरत बहुते जुग हार्यो, मानस देह लही ।
नानक कहत मिलन की बिरिया, सुमिरत कहा१ नहीं ॥३॥
(६)
मन मूरख काहे बिल्लावै, पूर्व लिखे का लेखा पावै ॥१॥
दुक्ख सुक्ख प्रब देवनहार, अवर त्यागि तूँ तिसै चितार ॥२
जो कछु करै सोई सुख मान, भूला काहे फिरै अयान ॥३॥
(१) क्यों।