संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सूरदासजी
अब कैसे निर्वारि१ जात है, 'मिले दुग्ध ज्यौं पानी
सूरदास प्रभु अंतरजामी, उर अंतर की जानी ॥ ३ ॥
(६)
नेक नहीं मन घर सौं लागत ।
पिता मात गुरुजन परबोधत२,
नीके बचन बान सम लागत ॥ १ ॥
तिन को धृग धृग कहति मनहिँ मन,
इन कौं बनै भले ही त्यागत ।
स्याम-विमुख नर नारि वृथा सब,
कैसे मन इन सौं अनुरागत ॥ २ ॥
इन को बदन३ प्रात दरखो जिनि,
बार बार बिधि४ सौं यह माँगत ,
यह तन सूर स्याम को अर्ध्यो,
नेक टरत नहिँ सोवत जागत ॥ ३ ॥
॥ विनय ॥
(१)
तुम मेरी राखो लाज हरी ।
तुम जानत सब अन्तरजामी, करनी कछु न करी ॥१॥
औगुन मोसे बिसरत नाहीं, पल छिन घरी घरी ।
सब प्रपंच की पोट बाँध करि, अपने सीस घरी ॥२॥
दारा सुत धन मोह लिये हौं, सुधि बुधि सब बिसरी ।
सूर पतित को बेग उधारो, अब मेरी नाव भरी ॥३॥
(२)
हमारे प्रभु औगुन चित न धरो ।
सम-दरसी है नाम तिहारो, अब मोहिँ पार करो ॥१॥
(१) सुलझाई या अलग की जा सकती है। (२) समझाते हैं। (३) मुँह ।
(४) ब्रह्मा ।