संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 69, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें६० सूरदासजी
जा दिन गमन किये मथुरा में, गोपिन सुधि बिसरे री।
हम को जोग भोग कुबजा को, का तकसीर है मोरी,
कहा कछु कीन्ही चोरी ॥ ५ ॥
सूरदास प्रभु सौँ जा कहियो, आवै अवधि रही थोरी।
प्रान दान दीजो नँद नन्दन, गावत कीरति तोरी।
प्रीति अब कीजै बहोरी ॥ ६ ॥
(८)
कुब्जा ने जादू डारा, जिन मोह्यो स्याम हमारा री ॥टेक
निसि दिन चलत रहत नहिं राखै, इन नैनन जलधारा री ॥१
अब यह प्रान कैसे हम राखैं, बिछुरे प्रान-अधारा री ॥२॥
ऊधो तब तैं कलन परत है, जब तैं स्याम सिधारा री ॥३॥
अब तो मधुबन जाय ले आवो, सुन्दर नन्द दुलारा री ॥४॥
सूरदास प्रभु आन मिलावो, तन मन धन सब वारा री ॥५॥
॥ प्रेम ॥
(१)
नाहिँन रह्यो मन में ठौर।
नन्द नन्दन अछत¹ कैसे, आनिये उर और ॥ १ ॥
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत रात।
हृदय तैं वह स्याम मूरत, छिन न इत उत जात ॥ २ ॥
कहत कथा अनेक ऊधो, लोक लाज दिखाव।
कहा करौँ तन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समात ॥ ३ ॥
स्याम गात सरोज आनन², ललित गति मृदु हाँस।
सूर ऐसे रूप कारन, मरत लोचन प्यास ॥ ४ ॥
(२)
या ऋतु रूस रहन की नाहीँ।
बरसत मेघ मेदिनी के हितु, प्रीतम हरष बढ़ाहीँ ॥ १ ॥
(१) के होते। (२) कमल जैसा मुख।