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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 267 में से

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पृष्ठ 66

शब्द संग्रह ५७
॥ विरह ॥
(१)
अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी ।
देख्यो चाहत कमल नैन को, निसि दिन रहत उदासी ॥१॥
केसर तिलक मोतिन की माला, वृन्दावन के बासी ।
नेह लगाय त्यागि गये तृन सम, डारि गये गल फाँसी ॥२॥
काहू के मन की को जानत, लोगन के मन हाँसी ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिन, लेहैं करवत कासी ॥३॥
(२)
बिन गोपाल बैरन भईं कुंजैं ॥ टेक ॥
तब ये लता लगत अति सीतल,
अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं१ ॥ १ ॥
वृथा बहत जमुना खग बोलत,
वृथा कमल फूलत अलि२ गुंजैं ॥ २ ॥
सूरदास प्रभु को मग जोवत,
अँखियाँ भईं अरुन३ ज्यों गुंजैं४ ॥ ३ ॥
(३)
निसि दिन बरसत नैन हमारे ।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जब से स्याम सिधारे ॥१॥
अंजन थिर न रहत अँखियन मैं, कर कपोल भये कारे ।
कंचुकि५ पट सूखत नहिँ कबहूँ, उर बिच बहत पनारे ॥२॥
आँसू सलिल६ भये पग थाके, बहे जात सित७ तारे ।
सूरदास अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे ॥३॥
(१) समूह । (२) भौंरा । (३) लाल । (४) घुँघची । (५) चोली । (६) नदी ।
(७) बँधे या जड़े हुए ।
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