संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ सूरदासजी
(४)
हरि के सँग मैं क्यों न गई री ॥ टेक ॥
हरि सँग जाती कंचन बन आती,
अब माटी के मोल भई री ॥ १ ॥
बरज्यो न कोई इन दूतिन को,
जाती बेर मोहिँ रोक लई री ॥ २ ॥
हरि विछुरन इक मरन हमारा,
नई दासी सँग प्रीति भई री ॥ ३ ॥
छल गयो कान्ह बहुरि नहिँ आयो,
अपने हाथ से मैं बिदा दई री ॥ ४ ॥
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को,
पिछली प्रीति अब नई भई री ॥ ५ ॥
(५)
राग बिलावल
ऊधो इतनी कहियो जाय ।
अति कृस-गात१ भई हैं तुम बिन, बहुत दुखारी गाथ ॥१॥
जल समूह बरसत अँखियन तैं, हूँकत लै लै नाँव ।
जहाँ जहाँ गउ दोहन करते, ढूँढ़त सोइ सोइ ठाँव ॥२॥
परत पछार खाय तेही छिन, अति ब्याकुल ह्वै दीन ।
मानो सूर काढ़ि डारी हैं, बारि मध्य तैं मीन ॥३॥
(६)
होली
सखी री मोहन मुसकाने, लागी सोई पै जाने ॥टेक॥
रात मोहन सुपने मैं देखे, सिथिल भये मोरे प्राने ।
बिरहा हूक लगी पसुरी मैं, नैन नीर बरसाने,
सखी जिउरा घबराने ॥ १ ॥
(१) दुबला ।