संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
१६६ शब्द संग्रह
दम को डोरा खोज दरीबा¹ खूब है ।
अगर दीप सतलोक अजब महबूब है ॥ ४ ॥
सुता² पुत्र गृह नारि छार सब गात रे ।
का सूँ लाया नेह संग नहिँ साथ रे ॥ ५ ॥
हंस अकेला जाय हिरंबर हेत रे ।
सबद हमारा मान नाम निज चेत रे ॥ ६ ॥
कोतल घोड़े पीनस³ रथ सँग पालकी ।
गज गैबर⁴ दल ठाठ निसानी काल की ॥ ७ ॥
हक हलाल पहिचान बदी कर दूर रे ।
यह मुरगी रब रूह गऊ क्या सूर⁵ रे ॥ ८ ॥
तीतर चिड़ी बटेर भखे हलवान रे ।
मुल्ला बाँग पुकार अलह रहमान रे ॥ ६ ॥
रंमजानी रमजान घास चोखा दिया ।
पकड़ पछाड़ी रूह कहो यह क्या किया ॥ १० ॥
खूनी खून मँझार खाल क्यूँ काढ़ता ।
देखै रब रहमान गला क्यूँ बाढ़ता⁶ ॥ ११ ॥
ऐसे बूड़ै नाव होत हैं गरक रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब नाम निज परख रे ॥१२
अरिल
(३)
यह सौदा सतभाय⁷ करो परभात रे ।
तन मन रतन अमोल बटाऊ⁸ साथ रे ॥ १ ॥
बिछुर जायँगे मीत मता सुन लीजिये ।
बहुर न मेला होय कहो क्या कीजिये ॥ २ ॥
(१) झोपड़ा । (२) बेटी । (३) एक तरह की छोटी पालकी । (४) हाथियों का
झुंड । (५) सूअर । (६) काटता । (७) सत्त भाव । (८) डाकू ।
गरीबदास जी १८७
सील संतोप बिबेक दया के धाम हैं ।
ज्ञान रतन गुलजार सँघाती राम हैं ॥ ३ ॥
धरम धजा फरकंत फरहरै लोक रे ।
ता मध अजपा नाम सु सौदा रोक१ रे ॥ ४ ॥
चलै बनिजवा२ ऊठ३ हूँठ गढ़ छोड़ रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब लगे जम डाँड़ रे ॥५॥
॥ बेहद ॥
अरिल छंद
(१)
बिना मूल अस्थूल, गगन में रमि रहा ।
कोई न जाने भेव, सकल सच भ्रमि रहा ॥ १ ॥
अच्छै बृच्छ बिस्तार, अपार अजोख है ।
नहीं गाम नहिं धाम, भुक्त नहिं मोख है ॥ २॥
छत्र_ सिंघासन सेत, पुरुष का रूप है ।
वरन अवरन बिचार, न छाया धूप है ॥ ३॥
देख पदम उँजियार, परख नहिं आवहीं ।
करम लिखा सो होय, टरै नहिं भावहीँ४ ॥ ४ ॥
अविगत पूरन ब्रह्म, परम परवान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब, सबद पहिचान रे ॥५॥
॥ विनय ॥
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द५ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मिहरबान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
(१) नक़्द दाम से मिलने का । (२) बंजारा, प्राण । (३) उठना । (४) भावी=होन-
हार । (५) साख, वरदान ।
१६८ शब्द संग्रह
बाँदी-जाद१ गुलाम, गुलाम गुलाम है।
खड़ा रहै दरबार, सु आठो जाम है॥३॥
सेवक तलबदार२, तुम्हरे दर कूकहीँ।
औगुन अनँत अपार, परी मोहिँ चूक हीँ॥४॥
मैं घर का बन्दाजादा, अरज मेरि मानिये।
कहता दास गरीब, अपन कर जानिये॥५॥
॥ साध महिमा ॥
सोई साध अगाध है, आपा न सरावै३।
पर-निंदा नहिँ संचरै, चुगली नहिँ खावै॥१॥
काम क्रोध त्रिसना नहीं, आसा नहिँ राखै।
साचे सूँ परचा भया, जब कूड न भाखै॥२॥
एकै नजर निरंजना, सबही घट देखै।
ऊँच नीच अंतर नहीं, सब एकै पेखै॥३॥
सोई साध सिरोमनी, जप तप उपकारी।
भूले कूँ उपदेस दे, दुर्लभ संसारी॥४॥
अकल४ यकीन पठाय दे, भूले कूँ चेतै।
सो साधू संसार मैं, हम बिरले भँटै॥५॥
सूतक५ खोवै सत कहै, साचे सूँ लावै।
सो साधू संसार मैं, हम बिरले पावै॥६॥
निरख निरख पग धरत हैं, जिव हिंसा नाहीं।
चौरासी तारन तरन, आये जग माहीं॥७॥
इस सौदे कूँ उतरे, सौदागर सोई।
भरे जहाज उतारि दे, भौसागर लोई॥८॥
(१) लौंडी-बच्चा। (२) तनख़ाह पाने वाले। (३) सराह्रै। (४) बुद्धि।
(५) अशुद्धता।
गरीवदास जी १६६
भेष धरैं आगे फिरैं, बहु साखी सीखैं ।
जानैं नहीं विवेक कूँ, खर के ज्यूँ रीकैं १ ॥६॥
खास मुकामा दरस है, जो अरस रहता ।
उनमुन मैं तारी लगी, जहँ अजप जपंता ॥१०॥
सुन्न महल अस्थान है, जहँ इस्थिर डेरा ।
दास गरीब सुभान२ है, सत साहिब मेरा ॥११॥
॥ सारगहनी ॥
मन मगन भया जब क्या गावै ॥ टेक ॥
ये गुन इंद्री दमन करेगा, वस्तु अमोली सो पावै ॥१॥
तिरलोकी की इच्छा छाड़ै, जग मैं विचरै निर्दावै ॥२॥
उलटी सुलटी निरति निरंतर, बाहर से भीतर लावै ॥३॥
अधर सिंहासन अविचल आसन, जहँवाँ सूरति ठहरावै॥४
त्रिकुटी महल मैं सेज बिछी है, द्वादस३ अंदर छिप जावै ॥५॥
अजर अमर निज मूरत सूरत, ओअं सोहं दम ध्यावै ॥६॥
सकल मनोरथ पूरन साहिब, बहुरि नहीं भौजल आवै ॥७॥
गरीबदास सतपुरुष बिदेही, साचा सतगुरु दरसावै ॥८॥
॥ उपदेश ॥
(१)
घट ही मैं चंद चकोरा साधो, घट ही चंद चकोरा ॥टेक॥
दामिनि दमकै घनहर४ गरजै, बोलै दादुर मोरा ।
सतगुरु गस्ती गस्त फिरावै, फिरता ज्ञान ढँढोरा ॥१॥
अदली राज अदल बादसाही, पाँच पचीसो चोरा ।
चीन्हो सबद सिंध घर कीजै, होना गारतगोरा५ ॥२॥
(१) यह नवीं कड़ी भगली साधू और भेष के लक्षण बतलाती है। (२) पवित्र ।
(३) द्वादस दल = कमल त्रिकुटी । (४) बादल । (५) नाश ।
२०० शब्द संग्रह
त्रिकुटी महल मैं आसन मारो, जहँ न चलै जम जोरा ।
दास गरीब भक्ति को कीजो, हुआ जात है भोरा१ ॥३॥
(२)
राम सुमिर राम सुमिर, राम सुमिर लै रे ।
जम और जहान जीत, तीन लोक जै रे ॥१॥
इन्द्री अदालत चोर, पकड़ो मन अहि२ रे ।
अनहद टंकोर घोर, सुनै व्यूँ न बहिरे ॥२॥
सुरत निरत नाद बिंद, मन पवना गहि रे ।
उनमुनी अलेल३ रूप, निराकार लहि रे ॥३॥
धनुष४ ध्यान मार बान५, दुरजन से फहिरे६ ।
देखत के सीत कोट, भरम बुर्ज ढहि रे ॥४॥
साचे से प्रीत कीन, झूठा मन महि७ रे ।
कहत है गरीबदास, कुटिल बचन सहि रे ॥५॥
(३)
मग८ पूछत हैं परतीत नहीं, वादी६ बादी१० झगड़ा ठानैं ।
मुकता जुगुता नहिं राह ल
गुलाल साहिब २०१
एकै बिंद एक भग द्वारा । एकै सब घट बोलनहारा ॥३॥
कौम छतीस एकही जाती । ब्रह्मबीज सब की उतपाती॥४
एकै कुल एकै परिवारा । ब्रह्मबीज का सकल पसारा ॥५॥
ऊँच नीच इस बिधि है लोई । कर्म कुकर्म कहावै दोई ॥६॥
गरीबदास जिन नाम पिछाना। ऊँच नीच पद ये परमाना॥७
गुलाल साहिब
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २०८]
॥ नाम ॥
नाम रस अमरा है भाई, कोउ साध संगति तैं पाई ॥टेक॥
बिन घोटे बिन छाने पीवे, कौड़ी दाम न लाई ।
रंग रँगीले चढ़त रसीले, कवहौँ उतरि न जाई ॥ १ ॥
छके छकाये पगे पगाये, झूमि झूमि रस लाई ।
बिमल बिमल बानी गुन बोलै, अनुभव अमल चलाई ॥२॥
जहँ जहँ जावै थिर नहिँ आवै, खोल¹ अमल लै धाई ।
जल पत्थल पूजन करि मानत, फोकट गाढ़ बनाई² ॥३॥
गुरु परताप कृपा तैं पावै, घट भरि प्याल³ फिराई ।
कहै गुलाल मगन ह्वै बैठे, भगिहै हमरि बलाई ॥४॥
॥ अनहद शब्द ॥
रे मन नामहिँ सुमिरन करै ।
अजपा जाप हृदय लै लावो, पाँच पच्चीसो तीन मरै ॥१॥
(१) थोथा। (२) सैंत में गढ़ के बनाया है। (३) प्याला।
२६
२०२ शब्द संग्रह
अष्ट कमल मँ जीव बसतु है, द्वादस मैं गुरु दरस करै ।
सोरह ऊपर बानि उठतु है, दुइ दल अमी झरै ॥२॥
गंगा जमुना मिली सरसुती, पदुम झलक तहँ करै ।
पच्छिम दिसा ह्वै गगन मँडल मैं, काल बली सों लरै ॥३॥
जम जीतो है परम पद पायो, जोती जगमग बरै ।
कह गुलाल सोइ पूरन साहिब, हर दम मुक्ति फरै ॥४॥
॥ प्रेम ॥
(१)
अबिगत जागल हो सजनी ।
खोजत खोजत सतगुरु पावल,
ताहि चरनवाँ चितवा लागल हो सजनी ॥टेक॥
साँझि समय उठि दीपक बारल,
कटल करमवा मनुवाँ पागल¹ हो सजनी ॥ १ ॥
चललि उबटि बाट छुटलि सकल घाट,
गरजि गगनवा अनहद बाजल हो सजनी ॥ २ ॥
गइली अनँदपुर भइली अगम सूर,
जितली मैदनवाँ नेजवा गाड़ल हो सजनी ॥ ३ ॥
कहै गुलाल हम प्रभुजी पावल,
फरल लिलरवा पपवा भागल हो सजनी ॥ ४ ॥
(२)
जो पै कोई प्रेम को गाहक होई ।
त्याग करै जो मन की कामना, सीस दान दै सोई ॥१॥
और अमल की दर जो छोड़ै, आपु अपन गति जोई ।
हर दम हाजिर प्रेम पियाला, पुलकि पुलकि रस लेई ॥२॥
(१) पगा या लीन हुआ ।
गुलाल साहिब २०३
जीव पीव महँ पीव जीव महँ, गनी बोलत सोई ।
सोई सबन महँ हम सबहन महँ, बूझत बिरला कोई ॥३॥
बा की गती कहा कोइ जानै, जो जिय साचा होई ।
कह गुलाल वे नाम समाने, मत भूले नर लोई ॥४॥
(३)
आनँद बरखत बुन्द सुहावन ।
उमँगि उमँगि सतगुरु बर राजित, समय सुहावन भावन ॥१
चहूँ ओर घनघोर घटा आई, सुन्न भवन मन-भावन ।
तिलक तत्त बँदी पर झलकत, जगमग जोति जगावन ॥२॥
गुरु के चरन मन मगन भयो जब, विमल विमल गुन गावन ।
कहै गुलाल प्रभु कृपा जाहि पर, हर दम भादौँ सावन ॥३॥
(४)
होली
संतगुरु सँग होरी खेलो, अनहद तूर बजाई ॥ टेक ॥
काया नगर मैं होरी खेलो, प्रेम कै परल धमारी ।
पाँच पचीस मिलि चाचरि गावहिँ, प्रभुजी की बलिहारी ॥१
सहज कै फाग पर्यो निस बासर, भरि छूटै पिचुकारी ।
नाद बिंदहीँ गाँठि पर्यो जब, परलि परसपर सारी ॥२॥
तारी दै दै भाँवरि नावहिँ, एक तैं एक पियारी ।
तत्त अबीर उड़ावत कर धरि, काहू कोउ न सँभारी ॥३॥
अब खेलो मन महा मगन है, तन मन सर्वस वारी ।
कह गुलाल हम प्रभु सँग खेलल, पूजलि आस हमारी ॥४॥
॥ विनय ॥
(१)
दोना-नाथ अनाथ यह, कछु पार न पावै ।
बरनौँ कवनी जुक्ति से, कछु उक्ति न आवै ॥ १ ॥
२०४ शब्द संग्रह
यह मन चंचल चोर है, निस वासर धावै ।
काम क्रोध मैं मिलि रह्यो, ईहै मन भावै ॥२॥
करुनामय किरपा करहु, चरनन चित लावै ।
सतसंगति सुख पाइ कै, निसु वासर गावै ॥३॥
अबकि बार यह अंध पर, कछु दाया कीजै ।
जन गुलाल बिनती करै, अपनो करि लीजै ॥४॥
(२)
प्रभुजी बरषा प्रेम निहारी ।
ऊठत बैठत छिन नहिं बीतत, याही रीति तुम्हारी ॥१॥
समय होय भा असमय होवै, भरत न लागत बारी ।
जैसे प्रीति किसान खेत साँ, तैसे है जन प्यारी ॥२॥
भक्त-बछल है बान तिहारी, गुन औगुन न बिचारी ।
जहँ जहँ जावैँ नाम गुन गावत, जम को सोच निवारी ॥३॥
सोवत जागत सरन धरम यह, पुलकित मनहिँ बिचारी ।
कह गुलाल तुम ऐसा साहिब, देखत न्यारी न्यारी ॥४॥
॥ भेद ॥
(१)
उलटि देखो, घट मैं जोति पसार ।
बिनु बाजे तहँ धुनि सब होवै, बिगसि कमल कचनार ॥१॥
पैठि पताल सूर ससि बाँधौ, साधौ त्रिकुटी द्वार ।
गंग जमुन के वार पार बिच, भरतु है अमिय करार ॥२॥
इंगला पिंगला सुखमन सोधो, बहत सिखर-मुख¹ धार ।
सुरति निरति ले बैठु गगन पर, सहज उठै झनकार ॥३॥
(१) ऊँचे की ओर ।
सौहं डोरी मूल गहि बाँधो, मानिक बरत लिलार ।
कह गुलाल सतगुरु घर पायो, भरो है मुक्ति भंडार ॥४॥
(२)
बसंत
मन मधुकर खेलत बसंत ।
बाजत अनहद गति अनंत ॥ १ ॥
बिगसत कमल भयो गुंजार ।
जोति जगमग करि पसार ॥ २ ॥
निरखि निरखि जिय भयो आनंद ।
बाझल¹ मन तहँ परल फंद ॥ ३ ॥
लहरि लहरि बहै जोति धार ।
चरन कमल मन मिलो हमार ॥ ४ ॥
आवै न जाइ मरै नहिँ जीव ।
पुलकि पुलकि रस अमिय पीव ॥ ५ ॥
अगम अगोचर अलख नाथ ।
देखत नैनन भयो सनाथ ॥ ६ ॥
कह गुलाल मोरी पुजलि आस ।
जम जीत्यो भयो जोति बास ॥ ७ ॥
॥ उपदेश ॥
(१)
हरि नाम न लेहु गँवारा हो ।
[L2
२०६ शब्द संग्रह
धंधा धोख रहत लपटाने, मोह रतो संसारा हो ।
कहै गुलाल सतगुरु बलिहारी, जग तैं भयो नियारा हो ॥४॥
(२)
अवधू निर्मल ज्ञान विचारो ।
ब्रह्म सरूप अखंडित पूरन, चौथे पद सैं न्यारो ॥१॥
ना वह उपजै ना वह बिनसै, ना भरमै चौरासी ।
है सतगुरु सतपुरुष अकेला, अजर अमर अबिनासी ॥२॥
ना वा के बाप नहीं वा के माता, वा के मोह न माया ।
ना वा के जोग भोग वा के नाहीं, ना कहुँ जायन आया ॥३॥
अद्भुत रूप अपार बिराजै, सदा रहै भरपूर ।
कहै गुलाल सोई जन जानै, जाहि मिलै गुरु सूरा ॥४॥
(३)
मन तूँ हरि गुन काहे न गावै ।
ता तैं कोटिन जनम गँवावै ॥ १ ॥
घर मैं अमृत छोड़ि कै, फिरि फिरि मदिरा पावै ।
छोड़हु कुमति मूढ़ अब मानहु, बहुरि न ऐसो दावै ॥२॥
पाँच पचीस नगर के बासी, तिनहिँ लिये सँग धावै ।
बिन पर उड़त रहै निसि बासर, ठौर ठिकान न आवै ॥३॥
जोगी जती तपी निर्बानी, कपि ज्यौँ बाँधि नचावै ।
सन्यासी बैरागी मौनी, धै धै नरक मिलावै ॥४॥
अबकी बार दाव है मेरो, छोड़ौं न राम दुहाई ।
जन गुलाल अवधूत फकीरा, राखौँ जँजीर भराई ॥५॥
॥ माया ॥
संतो कठिन अपरबल नारी ।
सबहीँ बरलहि१ भोग कियो है, अजहूँ कन्या कारी ॥१॥
(१) ब्याह करके ।
गुलाल साहिब २०७
जननी१ ह्वै के सब जग पाला, बहु विधि दूध पियाई ।
सुंदर रूप सरूप सलोना, जोध२ होइ जग खाई ॥२॥
मोह जाल सों सबहिं भ्रमायो, जहँ तक है तन-धारी ।
काल सरूप प्रगट है नारी, इन कहँ चलहु सँभारी ॥३॥
ज्ञान ध्यान सब ही हरि लीन्हो, काहु न आप सँभारी ।
कहै गुलाल कोऊ कोउ उबरे, सतगुरु की बलिहारी ॥४॥
॥ मिश्रित ॥
तत्त हिंडोलवा सतगुरु नावल तहवाँ मनुवाँ झूलत हमार ॥टेक
बिनु डोरी बिनु खंभे पौढ़ल, आठ पहर झनकार ॥१॥
गावहु सखियाँ हिंडोलवा हो, अनभै मंगलचार ॥२॥
अब नहिँ अवना जवना हो, प्रेम पदारथ भइल निनार॥३
छुटल जगत कर झुलना हो, दास गुलाल मिलो है यार ॥४॥
भीखा साहिब
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २१० ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
मेरा हित सोइ जो गुरु ज्ञान सुनावै ॥ टेक ॥
दूजी दृष्टि दुष्ट सम लागै, मन उनमेख३ बढ़ावै ।
आतम राम सूछम सरूप, केहि पटतर४ दै समझावै ॥१॥
सबद प्रकास बिनाहिँ५ जोग विधि, जगमग जोति जगावै।
धन्य भाग ता चरन रेनु ले, भीखा सीस चढ़ावै ॥२॥
(१) मा । (२) स्त्री । (३) तरंग । (४) उपमा । (५) बग़ैर ।
२०८ शब्द संग्रह
कुंडलिया
(२)
जौ भल चाहो आपनो, तौ सतगुरु खोजहु जाइ ॥
सतगुरु खोजहु जाइ, जहाँ वै साहिब रहते ।
निसि दिन इहै बिचार, सदा हरि को गुन कहते ॥
समुझै बूझि विचारि कै, तन मन लावै सेव ।
कृपा करहिँ तब रीझि कै, नाम देहिँ गुरुदेव ॥
भीखा बिछुरे जुगन के, पल महँ देहिँ मिलाइ ।
जौ भल चाहो आपनो, तौ सतगुरु खोजहु जाइ ॥
॥ अनहद शब्द ॥
धुनि बजत गगन महँ बीना, जहँ आपु रास रस भीना ॥टेक
भेरी१ ढोल संख सहनाई, ताल मृदंग नवीना ।
सुर जहाँ बहुतै मौज सहज उठि, परत है ताल प्रबीना ॥१॥
बाजत अनहद नाद गहागह, धुधुकि धुधुकि सुर झीना ।
अँगुरी फिरत तार सातहुँ पर, लय निकसत भिन भीना२ ॥२
पाँच पचीस बजावत गावत, निर्त बारु३ छबि दीन्हा ।
उघटत तननन ध्रितां ध्रितां, कोउ ताथेइ थेइ तत कीन्हा ३
बाजत ताल तरँग बहु, मानो जंत्री जंत्र कर लीन्हा ।
सुनत सुनत जिव थकित भयो, मानो है गयो सबद अधीना ४
गावत मधुर चढ़ाय उतारत, रुनझुन रुनझुन धीना४ ।
कटि किंकिनि पगु नूपुर की छबि, सुरति निरति लौलीना ५
आदि सबद ओंकार उठतु है, अटुट रहत सब दीना५ ।
लागी लगन निरंतर प्रभु सैँ, भीखा जल मन भीना ॥६॥
(१) एक बाजे का नाम । (२) भिन्न भिन्न या भाँति भाँति की । (३) सुन्दर ।
(४) ताधिन ताधिन । (५) सब दिन यानी सदा एक रस रहता है ।
भीखा साहिब २०४
॥ चेतावनी ॥
मन मानि ले तू कहल हमार ।
फिरि फिरि मानुष जनम न पैहौ, चौरासी औतार ॥टेक॥
पागा माया बिषै मिठाई, काम क्रोध रत सोई ।
सुर नर मुनि गन गंधर्ब कछु कछु, चाखत है सब कोई॥१॥
त्रिविधि ताप को फंद परो है, सूझत वार न पारा ।
काल कराल बसै निकटहिं, धरि मारि नर्क महँ डारा ॥२॥
संत साध मिलि हाट लगायो, सौदा नाम भराई ।
जो जा को अधिकार होत तिन, तैसी बस्तु मोलाई ॥३॥
सब भक्तन धन धाम सकल लै, सरनागति मैं डारा ।
समझो बूझि विचारि उतारो, अपने सिर को भारा ॥४॥
जोग जुक्ति कै परचा पैहौ, सुरति निरति ठहराई ।
अर्ध उर्ध के मध्य निरंतर, अनहद धुनि गहराई ॥५॥
सुरति मगन परमारथ जागै, करम होहि जरि छारा, ।
ज्ञान ध्यान कै खानि खुलै जब, तब छूटै संसारा ॥६॥
भक्ति भाव कल्पद्रुम छाया, ताप रहै नहिँ देई ।
चारि पदारथ अज्ञाकारी, पर२ सौँ कबहिँ न लेई ॥७॥
राम नाम फल मिलो जाहि को, प्रेम सुधा रस धारा ।
पुलकि पुलकि मन पान करो तुम, निस दिन बारम्बारा॥८॥
गुरु परताप कहाँ लगि बरनौं, उक्ती एक न आई ।
रसना जो कहिं होयँ सहसदस, उपमा गाइ न जाई ॥६॥
(१) राख । (२) पराया या दूसरा
२७
२१० शब्द संग्रह
आतम राम अखंडित आपै, निज साहिब बिस्तारा ।
भीखा सहज समाधी लाबो, औसर इहै तुम्हारा ॥१०॥
॥ प्रेम ॥
(१)
प्रीति की यह रीति बखानौँ ॥ टेक ॥
कितनौ दुख सुख परै दैह पर, चरन कमल कर ध्यानौ ॥१॥
हो चैतन्य बिचारि तजौ भ्रम, खाँड़ धूर जनि सानौ ॥२॥
जैसे चात्रिक स्वाँति बुन्द बिनु, प्रान समरपन ठानौ ॥३॥
भीखा जेहि तन राम भजन नहिँ, काल रूप तेहि जानौ ॥४॥
(२)
कहा कोउ प्रेम बिसाहन, जाय ।
महँग बड़ा गथ२ काम न आवै, सिर के मोल बिकाय ॥टेक॥
तन मन धन पहिले अरपन करि, जग के सुख न सुहाय ।
तजि आपा आपुहिँ ह्वै जीवै, निज अनन्य३ सुखदाय ॥१॥
यह केवल साधन को मत है, ज्यौँ गूँगे गुड़ खाय ।
जानहि भले कहै सो का सौँ, दिल की दिलहिँ रहाय ॥२॥
बिनु पग नाच नैन बिनु देखे, बिन कर ताल बजाय ।
बिन सरवन धुनि सुनै बिबिधि बिधि, बिन रसना गुन गाय३
निर्गुन मैं गुन क्यौँकर कहियत, व्यापकता समुदाय४ ।
जहँ नाहिँ तहँ सब कछु दिखियत, अँधरन की कठिनाय॥४॥
अजपा जाप अकथ को कथना, अलख लखन किन पाय ।
भीखा अविगत की गति न्यारी, मन बुधि चित न समाय॥५
(१) मोल लेना, ख़रीद करना। (२) सोच समझ । (३) बेमिलौनी, केवल ।
(४) सब जगह ।
भीखा साहिब २११
॥ समरथ ॥
ए हरि मीत बड़े तुम राजा ।
व्यापक जहाँ तहाँ लगु तुम्हरे हुकुम बिना कहुँ सरै न काजा ॥टेक
तिरगुन सूबा मौज बनाया, भिन्न भिन्न तहँ फौज रखाया ।
हय¹ गय² रथ सुखपाल बहूता, माया बढ़ी करै को कूता ।
कहत बनै नहिँ अनघड़ साजा, ए हरि मीत० ॥ १ ॥
चारो दिसा कनात गड़ा है, असमान तंबू बिन चोब खड़ा है।
पानी अगिनि पवनहै पायक, जो कछु काम सो करिबे लायक
अनहद ढोल दमामा बाजा, ए हरि मीत ० ॥ २ ॥
तारागन पैदल समुदाई, अज्ञा ले तहँ तहँ चलि जाई ।
चाँद सूर निसवासर आई, आवत जात मसाल दिखाई ।
ध्रुव कियो थीर अचल मन धाजा³, ए हरि मीत ० ॥३॥
सहजादा है मन बुधिकाला, कीन्हेव सकल जगत पैमाला।
काल बड़ा उमराव है भारी, डरे सकल जहँ लग तन धारी ।
तुम्हरे दंड सकल सिर ताजा, ए हरि मीत ० ॥ ४ ॥
सत्त सतोगुन मंत्र दृढ़ावा, ज्ञान आदि दे पुत्र बुलावा ।
अमल करहु तुम जग मैं जाई, फेरहु केवल राम दुहाई ।
नाम प्रताप प्रकास को छाजा, ए हरि मीत ० ॥ ५ ॥
चतुरंगिनि उज्ज्वल दल देखा, जोग बिराग बिचार को लेखा।
छिमा सील संतोष को भाऊ, परमारथ स्वारथ नहिँ चाऊ।
स्वारथ-रत पर पारहु गाजा⁴, ए हरि मीत ० ॥ ६ ॥
रज गुन तम गुन कीन्ह्यो मेला, सबहौँ भयो सतोगुन चेला।
हम तुम आड़ कछू नहिँ कीन्हा, अज्ञाईस सीस पर लीन्हा।
मरत बहुत डेर आपु की लाजा, ए हरि मीत ० ॥ ७ ॥
(१) घोड़ा। (२) हाथी । (३) ध्वजा, फरहरा । (४) जो स्वार्थी है उस पर
बिजली गिराते हैं।
२१२ शब्द संग्रह
पठयौ काम क्रोध मद लोभा, जा तैं कीन्ह सकल तन छोभा ।
केवल नाम भजै सो बाचै, नहिं तौ और सकल मनकाचै ।
भीखा तुम बिन कौन निवाजा१, ए हरि मीत बड़े तुम राजा८
॥ बिनती ॥
(१)
प्रभु जी करहु अपनो चेर ।
मैं तौ सदां जनम को रिनिया२, लेहु लिखि मोहिं केर ॥१॥
काम क्रोध मद लोभ मोह यह, करत सबहिन जेर ।
सुर नर मुनि सब पचि पचि हारे, परे करम के फेर ॥२॥
सिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक, ऐसे ऐसे ढेर ।
खोजत सहज समाधि लगाये, प्रभु को नाम न नेर ॥३॥
अपरंपार अपार है साहिब, ह्वै अधीन तन हेर ।
गुरु परताप साध की संगति, छुटे सो काल अहेर३ ॥४॥
त्राहि त्राहि सरनागत आयो, प्रभु दरवो४ यहि बेर ।
जन भीखा को उरिन कीजिये, अब कागद जिनि हेर ॥५॥
(२)
अस करिये साहिब दाया ॥ टेक ॥
कृपा कटाच्छ होइ जेहि तैं प्रभु, छूटि जाय मन माया ॥१॥
सोवत मोह निसा निस बासर, तुम्हीं मोहिं जगाया ॥२॥
जनमत मरत अनेक बार, तुम सतगुरु होय लखाया ॥३॥
भीखा केवल एक रूप हरि, ब्यापक त्रिभुवन राया ॥४॥
(३)
यार हे! हँसि बोलहु मो सौं, भरम गाँठि छूटै प्रभु तो सौं ॥१॥
पालन करि आये मो कहँ तुम, खाय जियाय कियो घर पोसे।२
(१) दया या परवरिश करना । (२) क़रज़दार । (३) शिकार । (४) दया कीजिये ।
बचन मेटि मैं कहौँ गरज वसि, दरदवंदप्रभुकुरैनगोसो१॥३
हो करता करमनके दाता, आगे बुधि आवत नहिँ होसो॥४
तुम अंतरजामी सब जानो, भीखा कहा करहि अपसोसो॥५
(४)
मोहिँ राखो जी अपनी सरन ॥ टेक ॥
अपरम्पार पार नहिँ तेरो, काह कहौँ का करन ॥१॥
मन क्रम बचन आस इक तेरी, होउ जनम या मरन ॥२॥
अबिरल भक्ति के कारन तुम पर, ह्वै ब्राम्हन देउँ धरन२ ॥३॥
जन भीखा अभिलाख इहो, नहिँ चहौँ मुक्ति गति तरन ॥४॥
॥ अद्वैत ॥
कवित
खुद एक भुम्मि३ आहि, बासन४ अनेक ताहि,
रचना विचित्र रंग, गढ़ेउ कुम्हार है ।
नाम एक सोन आस५, गहना ह्वै द्वैत भास,
कहूँ खरा खौँट रूप, हेमहिँ६ अधार है ॥
फेन बुदबुद अरु लहरि तरंग बहु,
एक जल जानि लीजै, मीठा कहूँ खार है ।
आतमा त्यौँ एक जाते७, भीखा कहै याहि मते,
ठग सरकार के, बटोही८ सरकार के ॥
॥ साध महिमा ॥
भजन तैँ उत्तम नाम फकीर ।
छिमा सील संतोष सरल चित, दरदवंद पर-पीर ॥टेक॥
कोमल गदगद गिरा६ सुहावन, प्रेम सुधा रस छीर ।
अनहद नाद सदा फल पायो, भोग खाँड़ घृत खीर ॥१॥
(१) गुस्सा । (२) धरना । (३) मिट्टी । (४) बरतन । (५) असल । (६) सोना ।
(७) एक ही जाति की । (८) मुसाफ़िर । (६) वानी ।
२१४ शब्द संग्रह
ब्रह्म प्रकास को भेष बनायो, नाम मेखला चीर ।
चमकत नूर जहूर जगामग, ढाँके सकल सरीर ॥ २ ॥
रहनि अचल इस्थिर कर आसन, ज्ञान बुद्धि मति धीर ।
देखत आतम राम उघारे, ज्योँ दरपन मधि हीर ॥३॥
मोह नदी भ्रम भँवर कठिन है, पाप पुन्य दोउ तीर ।
हरि जन सहजे उतरि गये ज्योँ, सूखे ताल को भीर¹ ॥४
जग परपंच करम बहतो है, जैसे पवन रु नीर ।
गुरु गम सबद समुद्रहिँ जावे, परत भयो जल थीर ॥५॥
केलि करत जिय लहरि पिया सँग, मति बड़ गहिर गंभीर ।
ताहि काहि.पटतरो² दीजिये, जिन तन मन दियो सीर³ ॥६
मन मतंग मतवार बड़ो है, सब ऊपर बल बीर ।
भीखा हीन मलीन ताहि को, छीन भयो जस जीर ॥७॥
॥ उपदेश ॥
(१)
मन तूँ राम से लौ लाव ।
त्यागि के परपंच माया, सकल जगहिँ नचाव ॥ १ ॥
साच की तू चाल गहि ले, झूठ कपट बहाव ।
रहनि सोँ लौ लीन है, गुरु-ज्ञान ध्यान जगाव ॥ २ ॥
जोग की यह सहज जुक्ति बिचार कै ठहराव ।
प्रेम प्रीति सोँ लागि के घट, सहजहीँ सुख पाव ॥ ३ ॥
दृष्टि तैँ आकृष्ट देखो, सुरति निरति बसाव ।
आतमा निर्धार निर्मी, बानि⁴ अनुभव गाव ॥ ४ ॥
अचल इस्थिर ब्रह्म सेवो, भाव चित अरुभाव ।
भीखा फिर नहिँ कबहुँ पैहौ, बहुरि ऐसो दाव ॥ ५ ॥
(१) छिछला पानी । (२) उपमा । (३) सिर अर्थात अहं । (४) वाणी ।
भीखा साहिब २१५
॥ रेख़्ता ॥
(२)
करो विचार निर्धार¹ अवराधिये²,
सहज समाधि मन लाव भाई ।
जब जक्त की आस तैं होहु नीरास,
तब मोच्छ दरबार की खबरि पाई ॥
न तो भर्म अरु कर्म विच भोग भटकन लग्यो,
जरा अरु मरन तन वृथा जाई ।
भीखा मानै नहीं कोटि उपदेस सठ,
थक्यौ वेदांत जुग चारि गाई ॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
अगह तुम्हरा न गहना है । अकह तुम कहा कहना है ॥१॥
सबद अरु ब्रह्म अधिकारी । चेतन तुम रूप तन धारी ॥२॥
अविगति तुम्हरी न गति पावै । कहाँ अस ज्ञान बुधि आवै ३
तुम्हरा कहि वार नहिँ पारा । केतो अनुमान करि हारा ॥४॥
अगम का गम कवन पावै । जहाँ नहिँ चित्त मन जावै ॥५॥
प्रगट तुम गुप्त सब माहीं । व्यापक तुम कहाँ नाहीं ॥६॥
सुनहु सब को कहहु सब से । देखहु सब को मिले तन से ॥७॥
जहाँ लगि सकल है तुम्हीं । धोख यह बीच हम हमहीं ॥८॥
छुटै जब तैं व मैं मेरा । तहाँ ठाकुर न कोउ चेरा ॥९॥
केवल सोइ आपु आपै है। दुइत सोइ जाय जा पै है। ॥१०॥
उभै³ हम एक है। तुम हीं । हमैं तुम्हैं भेद कम कमहीं ॥११॥
भीखा तजो भरम के ताईं । चीन्हो निज आपनो साईं ॥१२॥
(१) निरंतर । (२) आराधना करो । (३) दो ।