संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ शब्द संग्रह
ब्रह्म प्रकास को भेष बनायो, नाम मेखला चीर ।
चमकत नूर जहूर जगामग, ढाँके सकल सरीर ॥ २ ॥
रहनि अचल इस्थिर कर आसन, ज्ञान बुद्धि मति धीर ।
देखत आतम राम उघारे, ज्योँ दरपन मधि हीर ॥३॥
मोह नदी भ्रम भँवर कठिन है, पाप पुन्य दोउ तीर ।
हरि जन सहजे उतरि गये ज्योँ, सूखे ताल को भीर¹ ॥४
जग परपंच करम बहतो है, जैसे पवन रु नीर ।
गुरु गम सबद समुद्रहिँ जावे, परत भयो जल थीर ॥५॥
केलि करत जिय लहरि पिया सँग, मति बड़ गहिर गंभीर ।
ताहि काहि.पटतरो² दीजिये, जिन तन मन दियो सीर³ ॥६
मन मतंग मतवार बड़ो है, सब ऊपर बल बीर ।
भीखा हीन मलीन ताहि को, छीन भयो जस जीर ॥७॥
॥ उपदेश ॥
(१)
मन तूँ राम से लौ लाव ।
त्यागि के परपंच माया, सकल जगहिँ नचाव ॥ १ ॥
साच की तू चाल गहि ले, झूठ कपट बहाव ।
रहनि सोँ लौ लीन है, गुरु-ज्ञान ध्यान जगाव ॥ २ ॥
जोग की यह सहज जुक्ति बिचार कै ठहराव ।
प्रेम प्रीति सोँ लागि के घट, सहजहीँ सुख पाव ॥ ३ ॥
दृष्टि तैँ आकृष्ट देखो, सुरति निरति बसाव ।
आतमा निर्धार निर्मी, बानि⁴ अनुभव गाव ॥ ४ ॥
अचल इस्थिर ब्रह्म सेवो, भाव चित अरुभाव ।
भीखा फिर नहिँ कबहुँ पैहौ, बहुरि ऐसो दाव ॥ ५ ॥
(१) छिछला पानी । (२) उपमा । (३) सिर अर्थात अहं । (४) वाणी ।