संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ शब्द संग्रह
धंधा धोख रहत लपटाने, मोह रतो संसारा हो ।
कहै गुलाल सतगुरु बलिहारी, जग तैं भयो नियारा हो ॥४॥
(२)
अवधू निर्मल ज्ञान विचारो ।
ब्रह्म सरूप अखंडित पूरन, चौथे पद सैं न्यारो ॥१॥
ना वह उपजै ना वह बिनसै, ना भरमै चौरासी ।
है सतगुरु सतपुरुष अकेला, अजर अमर अबिनासी ॥२॥
ना वा के बाप नहीं वा के माता, वा के मोह न माया ।
ना वा के जोग भोग वा के नाहीं, ना कहुँ जायन आया ॥३॥
अद्भुत रूप अपार बिराजै, सदा रहै भरपूर ।
कहै गुलाल सोई जन जानै, जाहि मिलै गुरु सूरा ॥४॥
(३)
मन तूँ हरि गुन काहे न गावै ।
ता तैं कोटिन जनम गँवावै ॥ १ ॥
घर मैं अमृत छोड़ि कै, फिरि फिरि मदिरा पावै ।
छोड़हु कुमति मूढ़ अब मानहु, बहुरि न ऐसो दावै ॥२॥
पाँच पचीस नगर के बासी, तिनहिँ लिये सँग धावै ।
बिन पर उड़त रहै निसि बासर, ठौर ठिकान न आवै ॥३॥
जोगी जती तपी निर्बानी, कपि ज्यौँ बाँधि नचावै ।
सन्यासी बैरागी मौनी, धै धै नरक मिलावै ॥४॥
अबकी बार दाव है मेरो, छोड़ौं न राम दुहाई ।
जन गुलाल अवधूत फकीरा, राखौँ जँजीर भराई ॥५॥
॥ माया ॥
संतो कठिन अपरबल नारी ।
सबहीँ बरलहि१ भोग कियो है, अजहूँ कन्या कारी ॥१॥
(१) ब्याह करके ।