संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 224, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीखा साहिब २१५
॥ रेख़्ता ॥
(२)
करो विचार निर्धार¹ अवराधिये²,
सहज समाधि मन लाव भाई ।
जब जक्त की आस तैं होहु नीरास,
तब मोच्छ दरबार की खबरि पाई ॥
न तो भर्म अरु कर्म विच भोग भटकन लग्यो,
जरा अरु मरन तन वृथा जाई ।
भीखा मानै नहीं कोटि उपदेस सठ,
थक्यौ वेदांत जुग चारि गाई ॥
॥ मिश्रित ॥
(१)
अगह तुम्हरा न गहना है । अकह तुम कहा कहना है ॥१॥
सबद अरु ब्रह्म अधिकारी । चेतन तुम रूप तन धारी ॥२॥
अविगति तुम्हरी न गति पावै । कहाँ अस ज्ञान बुधि आवै ३
तुम्हरा कहि वार नहिँ पारा । केतो अनुमान करि हारा ॥४॥
अगम का गम कवन पावै । जहाँ नहिँ चित्त मन जावै ॥५॥
प्रगट तुम गुप्त सब माहीं । व्यापक तुम कहाँ नाहीं ॥६॥
सुनहु सब को कहहु सब से । देखहु सब को मिले तन से ॥७॥
जहाँ लगि सकल है तुम्हीं । धोख यह बीच हम हमहीं ॥८॥
छुटै जब तैं व मैं मेरा । तहाँ ठाकुर न कोउ चेरा ॥९॥
केवल सोइ आपु आपै है। दुइत सोइ जाय जा पै है। ॥१०॥
उभै³ हम एक है। तुम हीं । हमैं तुम्हैं भेद कम कमहीं ॥११॥
भीखा तजो भरम के ताईं । चीन्हो निज आपनो साईं ॥१२॥
(१) निरंतर । (२) आराधना करो । (३) दो ।