संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीखा साहिब २०४
॥ चेतावनी ॥
मन मानि ले तू कहल हमार ।
फिरि फिरि मानुष जनम न पैहौ, चौरासी औतार ॥टेक॥
पागा माया बिषै मिठाई, काम क्रोध रत सोई ।
सुर नर मुनि गन गंधर्ब कछु कछु, चाखत है सब कोई॥१॥
त्रिविधि ताप को फंद परो है, सूझत वार न पारा ।
काल कराल बसै निकटहिं, धरि मारि नर्क महँ डारा ॥२॥
संत साध मिलि हाट लगायो, सौदा नाम भराई ।
जो जा को अधिकार होत तिन, तैसी बस्तु मोलाई ॥३॥
सब भक्तन धन धाम सकल लै, सरनागति मैं डारा ।
समझो बूझि विचारि उतारो, अपने सिर को भारा ॥४॥
जोग जुक्ति कै परचा पैहौ, सुरति निरति ठहराई ।
अर्ध उर्ध के मध्य निरंतर, अनहद धुनि गहराई ॥५॥
सुरति मगन परमारथ जागै, करम होहि जरि छारा, ।
ज्ञान ध्यान कै खानि खुलै जब, तब छूटै संसारा ॥६॥
भक्ति भाव कल्पद्रुम छाया, ताप रहै नहिँ देई ।
चारि पदारथ अज्ञाकारी, पर२ सौँ कबहिँ न लेई ॥७॥
राम नाम फल मिलो जाहि को, प्रेम सुधा रस धारा ।
पुलकि पुलकि मन पान करो तुम, निस दिन बारम्बारा॥८॥
गुरु परताप कहाँ लगि बरनौं, उक्ती एक न आई ।
रसना जो कहिं होयँ सहसदस, उपमा गाइ न जाई ॥६॥
(१) राख । (२) पराया या दूसरा
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