संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगरीबदास जी १८७
सील संतोप बिबेक दया के धाम हैं ।
ज्ञान रतन गुलजार सँघाती राम हैं ॥ ३ ॥
धरम धजा फरकंत फरहरै लोक रे ।
ता मध अजपा नाम सु सौदा रोक१ रे ॥ ४ ॥
चलै बनिजवा२ ऊठ३ हूँठ गढ़ छोड़ रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब लगे जम डाँड़ रे ॥५॥
॥ बेहद ॥
अरिल छंद
(१)
बिना मूल अस्थूल, गगन में रमि रहा ।
कोई न जाने भेव, सकल सच भ्रमि रहा ॥ १ ॥
अच्छै बृच्छ बिस्तार, अपार अजोख है ।
नहीं गाम नहिं धाम, भुक्त नहिं मोख है ॥ २॥
छत्र_ सिंघासन सेत, पुरुष का रूप है ।
वरन अवरन बिचार, न छाया धूप है ॥ ३॥
देख पदम उँजियार, परख नहिं आवहीं ।
करम लिखा सो होय, टरै नहिं भावहीँ४ ॥ ४ ॥
अविगत पूरन ब्रह्म, परम परवान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब, सबद पहिचान रे ॥५॥
॥ विनय ॥
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द५ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मिहरबान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
(१) नक़्द दाम से मिलने का । (२) बंजारा, प्राण । (३) उठना । (४) भावी=होन-
हार । (५) साख, वरदान ।