संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुलाल साहिब २०७
जननी१ ह्वै के सब जग पाला, बहु विधि दूध पियाई ।
सुंदर रूप सरूप सलोना, जोध२ होइ जग खाई ॥२॥
मोह जाल सों सबहिं भ्रमायो, जहँ तक है तन-धारी ।
काल सरूप प्रगट है नारी, इन कहँ चलहु सँभारी ॥३॥
ज्ञान ध्यान सब ही हरि लीन्हो, काहु न आप सँभारी ।
कहै गुलाल कोऊ कोउ उबरे, सतगुरु की बलिहारी ॥४॥
॥ मिश्रित ॥
तत्त हिंडोलवा सतगुरु नावल तहवाँ मनुवाँ झूलत हमार ॥टेक
बिनु डोरी बिनु खंभे पौढ़ल, आठ पहर झनकार ॥१॥
गावहु सखियाँ हिंडोलवा हो, अनभै मंगलचार ॥२॥
अब नहिँ अवना जवना हो, प्रेम पदारथ भइल निनार॥३
छुटल जगत कर झुलना हो, दास गुलाल मिलो है यार ॥४॥
भीखा साहिब
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ २१० ]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
मेरा हित सोइ जो गुरु ज्ञान सुनावै ॥ टेक ॥
दूजी दृष्टि दुष्ट सम लागै, मन उनमेख३ बढ़ावै ।
आतम राम सूछम सरूप, केहि पटतर४ दै समझावै ॥१॥
सबद प्रकास बिनाहिँ५ जोग विधि, जगमग जोति जगावै।
धन्य भाग ता चरन रेनु ले, भीखा सीस चढ़ावै ॥२॥
(१) मा । (२) स्त्री । (३) तरंग । (४) उपमा । (५) बग़ैर ।