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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 267 में से

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गुलाल साहिब २०३
जीव पीव महँ पीव जीव महँ, गनी बोलत सोई ।
सोई सबन महँ हम सबहन महँ, बूझत बिरला कोई ॥३॥
बा की गती कहा कोइ जानै, जो जिय साचा होई ।
कह गुलाल वे नाम समाने, मत भूले नर लोई ॥४॥
(३)
आनँद बरखत बुन्द सुहावन ।
उमँगि उमँगि सतगुरु बर राजित, समय सुहावन भावन ॥१
चहूँ ओर घनघोर घटा आई, सुन्न भवन मन-भावन ।
तिलक तत्त बँदी पर झलकत, जगमग जोति जगावन ॥२॥
गुरु के चरन मन मगन भयो जब, विमल विमल गुन गावन ।
कहै गुलाल प्रभु कृपा जाहि पर, हर दम भादौँ सावन ॥३॥
(४)
होली
संतगुरु सँग होरी खेलो, अनहद तूर बजाई ॥ टेक ॥
काया नगर मैं होरी खेलो, प्रेम कै परल धमारी ।
पाँच पचीस मिलि चाचरि गावहिँ, प्रभुजी की बलिहारी ॥१
सहज कै फाग पर्यो निस बासर, भरि छूटै पिचुकारी ।
नाद बिंदहीँ गाँठि पर्यो जब, परलि परसपर सारी ॥२॥
तारी दै दै भाँवरि नावहिँ, एक तैं एक पियारी ।
तत्त अबीर उड़ावत कर धरि, काहू कोउ न सँभारी ॥३॥
अब खेलो मन महा मगन है, तन मन सर्वस वारी ।
कह गुलाल हम प्रभु सँग खेलल, पूजलि आस हमारी ॥४॥
॥ विनय ॥
(१)
दोना-नाथ अनाथ यह, कछु पार न पावै ।
बरनौँ कवनी जुक्ति से, कछु उक्ति न आवै ॥ १ ॥