संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें२१० शब्द संग्रह
आतम राम अखंडित आपै, निज साहिब बिस्तारा ।
भीखा सहज समाधी लाबो, औसर इहै तुम्हारा ॥१०॥
॥ प्रेम ॥
(१)
प्रीति की यह रीति बखानौँ ॥ टेक ॥
कितनौ दुख सुख परै दैह पर, चरन कमल कर ध्यानौ ॥१॥
हो चैतन्य बिचारि तजौ भ्रम, खाँड़ धूर जनि सानौ ॥२॥
जैसे चात्रिक स्वाँति बुन्द बिनु, प्रान समरपन ठानौ ॥३॥
भीखा जेहि तन राम भजन नहिँ, काल रूप तेहि जानौ ॥४॥
(२)
कहा कोउ प्रेम बिसाहन, जाय ।
महँग बड़ा गथ२ काम न आवै, सिर के मोल बिकाय ॥टेक॥
तन मन धन पहिले अरपन करि, जग के सुख न सुहाय ।
तजि आपा आपुहिँ ह्वै जीवै, निज अनन्य३ सुखदाय ॥१॥
यह केवल साधन को मत है, ज्यौँ गूँगे गुड़ खाय ।
जानहि भले कहै सो का सौँ, दिल की दिलहिँ रहाय ॥२॥
बिनु पग नाच नैन बिनु देखे, बिन कर ताल बजाय ।
बिन सरवन धुनि सुनै बिबिधि बिधि, बिन रसना गुन गाय३
निर्गुन मैं गुन क्यौँकर कहियत, व्यापकता समुदाय४ ।
जहँ नाहिँ तहँ सब कछु दिखियत, अँधरन की कठिनाय॥४॥
अजपा जाप अकथ को कथना, अलख लखन किन पाय ।
भीखा अविगत की गति न्यारी, मन बुधि चित न समाय॥५
(१) मोल लेना, ख़रीद करना। (२) सोच समझ । (३) बेमिलौनी, केवल ।
(४) सब जगह ।