संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंगरीवदास जी १६६
भेष धरैं आगे फिरैं, बहु साखी सीखैं ।
जानैं नहीं विवेक कूँ, खर के ज्यूँ रीकैं १ ॥६॥
खास मुकामा दरस है, जो अरस रहता ।
उनमुन मैं तारी लगी, जहँ अजप जपंता ॥१०॥
सुन्न महल अस्थान है, जहँ इस्थिर डेरा ।
दास गरीब सुभान२ है, सत साहिब मेरा ॥११॥
॥ सारगहनी ॥
मन मगन भया जब क्या गावै ॥ टेक ॥
ये गुन इंद्री दमन करेगा, वस्तु अमोली सो पावै ॥१॥
तिरलोकी की इच्छा छाड़ै, जग मैं विचरै निर्दावै ॥२॥
उलटी सुलटी निरति निरंतर, बाहर से भीतर लावै ॥३॥
अधर सिंहासन अविचल आसन, जहँवाँ सूरति ठहरावै॥४
त्रिकुटी महल मैं सेज बिछी है, द्वादस३ अंदर छिप जावै ॥५॥
अजर अमर निज मूरत सूरत, ओअं सोहं दम ध्यावै ॥६॥
सकल मनोरथ पूरन साहिब, बहुरि नहीं भौजल आवै ॥७॥
गरीबदास सतपुरुष बिदेही, साचा सतगुरु दरसावै ॥८॥
॥ उपदेश ॥
(१)
घट ही मैं चंद चकोरा साधो, घट ही चंद चकोरा ॥टेक॥
दामिनि दमकै घनहर४ गरजै, बोलै दादुर मोरा ।
सतगुरु गस्ती गस्त फिरावै, फिरता ज्ञान ढँढोरा ॥१॥
अदली राज अदल बादसाही, पाँच पचीसो चोरा ।
चीन्हो सबद सिंध घर कीजै, होना गारतगोरा५ ॥२॥
(१) यह नवीं कड़ी भगली साधू और भेष के लक्षण बतलाती है। (२) पवित्र ।
(३) द्वादस दल = कमल त्रिकुटी । (४) बादल । (५) नाश ।