संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
चरनदासजी १७६
कोटि बिस्नु अनंत ब्रह्मा, सदा सिव जेहि ध्यावहीं।
सोइ मिला सहज सरूप केसो, अनँद मंगल गावहीं॥१२॥
चरनदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १४२]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
गुरु बिन और न जान, मान मेरा कहो।
चरनदास उपदेस, विचारत ही रहो ॥१॥
बेद रूप गुरु होहिं, कि कथा सुनावहीं।
पंडित को धरि रूप, कि अर्थ बतावहीं ॥२॥
कल्पवृच्छ गुरुदेव, मनोरथ सब सरैं।
कामधेनु गुरुदेव, छुधा तृस्ना हरैं ॥३॥
गुरु ही सेस महेस, तोहि चेतन करैं।
गुरु ब्रह्मा गुरु बिस्नु, हाथ खाली भरैं ॥४॥
गंगा सम गुरु होय, पाप सब धोवहीं।
सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि¹ लेवहीं ॥५॥
गुरु ही को करु ध्यान, नाम गुरु को जपौ।
आपा दीजै भेंट, पुजन गुरु ही थपौ ॥६॥
समरथ खो सुकदेव, कहा महिमा करौं।
अस्तुति कही न जाय, सीस चरनन धरौं ॥७॥
(१) खींच।
१८० शब्द संग्रह
(२)
गुरु दूती¹ बिन हे सखी, पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखौ, भावै तीरथ न्हाय ॥ १ ॥
पाँच सखी पच्चीस सहेली, अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानि कै, मेरो बालम लियो लुकाय²॥२॥
बेद पुरान सबै जो ढूँढ़े, स्रुति सिमरित सब धाय ।
आन धर्म औ क्रिया कर्म मैं, दीन्हो मोहिं भरमाय ॥३॥
भटकत भटकत जनमै हारी, चरन सखी गहे आय ।
सुकदेव साहिब किरपा करिकै, दीन्हो अलख लखाय ॥४॥
देखत ही सब भ्रम भय भागे, सिर सूँ गई बलाय ।
चरनदास जब प्रीतम पायो, दरसन कियो अघाय ॥५॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
अनहद सबद अपार दूर सूँ दूर है ।
चेतन निर्मल सुद्ध दैह भरपूर है ॥ १ ॥
निःअच्छर है ताहि और निःकर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥ २ ॥
या के कीन्हे ध्यान होत है ब्रह्म हीं ।
धारै तेज अपार जाहिँ सब भर्म हीं ॥ ३ ॥
या को छोड़ै नाहिं सदा रहै लीन हीं ।
यही जो अनहद सार जानि परबीन हीं ॥ ४ ॥
(२)
जब से अनहद घोर सुनी ।
इन्द्री थकित गलित मन हूवा, आसा सकल भुनी ॥१॥
घूमत नैन सिथिल भइ काया, अमल जु सुरत सनी ।
रोम रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी ॥२॥
(१) बिचौलिया । (२) छिपाय ।
चरनदासजी १८१
मतवारे ज्यौं सबद समाये, अंतर भींज कनी ।
करम भरम के बंधन छूटे, दुबिधा त्रिपत्ति हनी ॥३॥
आपा बिसरि जक्त कूँ बिसरो, कित रहिं पाँच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञान गुनी ॥४॥
हो तहँ लीन चरनहीं दासा, कहैं सुकदेव मुनी ।
ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै सिखर अनी¹ ॥५॥
॥ चितावनी ॥
(१)
अरे नर हरि का हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरन के काजे, तैं कछु औरै ठाना ॥१॥
गर्भ माहिँ जिन रच्छा कीन्ही, ह्वाँ खाने कूँ दीन्हा ।
ज़ठर अगिन सोँ राखि लियो है, अँग संपूरन कीन्हा ॥२॥
बाहर आय बहुत सुधि लीन्ही, दसन² बिना पय प्यायो।
दाँत भये भोजन बहु भाँती, हित सोँ तोहिँ खिलायो ॥३॥
और दिये सुख नाना बिधि के, समुझि देखु मन माहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो, तू कछु जानत नाहीं ॥४॥
तुव कारन सब कछु प्रभु कीन्हो, तू कीन्हा निज काजा ।
जग व्यौहार पगे ही बोले, तोहि न आवै लाजा ॥५॥
अजहूँ चेत उलट हरि साँही³, जन्म सुफल करु भाई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुमिरन है सुखदाई ॥६॥
(२)
कछु मन तुम सुधि राखौ वा दिन की ।
जा दिन तेरी देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की ॥१॥
जिन के संग बहुत सुख कीन्हे, मुख ढकि ह्वैहैं न्यारे ।
जम का त्रास होय बहु भाँती, कौन छुटावनहारे ॥२॥
(१) नोक । (२) दाँत । (३) ओर, तरफ़ ।
१८२ शब्द संग्रह
देहरी लौं तेरी नारि चलैगी, बड़ी पौरि लौं माई ।
मरघट लौं सब बीर भतीजे, हंस अकेलो जाई ॥३॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़े ही, पूत रहैं घर माहीं ।
जिन के काज पचे दिन राती, सो सँग चालत नाहीं ॥४॥
देव पितर तेरे काम न आवैं, जिन की सेवा लावै ।
चरनदास सुकदेव कहत ह, हरि बिन मुक्ति न पावै ॥५॥
(३)
अपना हरि बिन और न कोई ।
मातु पिता सुत बंधु कुटुँब सब, स्वारथ ही के होई ॥१॥
या काया कूँ भोग बहुत दै, मरद्दन करि करि धोई ।
सो भी छूटत नेक तनिक सी, संग न चाली खोई ॥२॥
घर की नारि बहुत ही प्यारी, तिन मैं नाहीं दोई१ ।
जीवत कहती साथ चलूँगी, डरपन लागी सोई ॥३॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्जल मति खोई।
आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्रान ले जोई ॥४॥
या जग में कोइ हितू न दीखै, मैं समझाऊँ तोई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुनि लीजै नर लोई ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सुधि बुधि सब गइ खोय री, मैं इश्क दिवानी ।
तलफत हूँ दिन रैन ज्यौँ, मछली बिन पानी ॥ १ ॥
बिन देखे मोहिँ कल न परत है, देखत आँख सिरानी२।
सुधि आये हिय मैं दव३ लागै, नैनन बरखत पानी ॥२॥
जैसे चकोर रटत चंदा को, जैसे पपिहा स्वाँती ।
ऐसे हम तलफत पिय दरसन, बिरह बिथा यहि भाँती ॥३॥
(१) एक जान दो क़ालिब । (२) सीतल हुई । (३) आग ।
चरनदासजी १८३
जब तैँ मील बिछोहा हूआ, तब तैँ कछु न सुहानी ।
अंग अंग अकुलात सखी री, रोम रोम मुरझानी ॥४॥
बिन मनमोहन सबन अँधेरो, भरि भरि आवै छाती ।
चरनदास सुकदेव मिलावो, नैन भये सेंगहिँ घाती१ ॥५॥
(२)
हमारो नैना दरस पियासा हो ।
तन गयो सूखि हाय हिये बाढ़ी, जीवल हूँ वोहि आसा हो ॥१
बिछुरन थारो२ मरन हमारो, मुख मैं चलै न ग्रासा३ हो ।
नींद न आवै रैनि बिहावै४, तारे गिनत अकासा हो ॥२॥
भये कठोर दरस नहिँ जाने, तुम कूँ नेक न साँसा५ हो ।
हमरो गति दिन दिन औरे ही, बिरह बियोग उदासा हो॥३
सुकदेव प्यारे मत रहु न्यारे, आनि करो उर बासा हो ।
रनजीता६ अपनो करि जानी, निज करि चरनन दासा हो॥४
(३)
[
१८८ सब्द संग्रह
गुरु सुकदेव दया केरैँ, हेली मोहिँ मिलावैँ काल ।
चरनदास दुख सब भजैँ, हेली सदा रहूँ पति नाल१ ॥५॥
॥ प्रेम ॥
गुरु हमरे प्रेम पियायो हो ।
ता दिन तैं पलटो भयो, कुल गोल नसायो हो ॥ १ ॥
अमल चढ़ो गगनै लगो, अनहद मन छायो हो ।
तेज पुंज की सेज पै, प्रीतम गल लायो हो ॥ २ ॥
गये दिवाने देसड़े, आनंद दरसायो हो ।
सब किरिया सहजै छुटी, तप नेम भुलायो हो ॥ ३ ॥
त्रैगुन तैं ऊपर रहूँ, सुकदेव बसायो हो ।
चरनदास दिन रैन नहिं, तुरिया पद पायो हो ॥ ४ ॥
॥ बिनती ॥
पतित उधारन बिरद² तुम्हारे ।
जो यह बात साच है हरि जू, तौ तुम हम कूँ पार उतारे ॥१
बालपने औ तरुन अवस्था, और बुढ़ापे माहीं ।
हम से भई सभी तुम जानौ, तुम से नेक छिपानी नाहीं ॥२
अनगिन पाप भये मनमाने, नखसिख औगुन धारी ।
फिरिफिरि कै तुम सरनै आयौ, अब तुम को है लाज हमारी ॥३
सुभ करमन को मारग छूटो, आलस निद्रा घेरो ।
एकहिँ बात भली बनि आई, जग में कहायो तेरो चेरो ॥४
दीनदयाल कृपाल बिसंभर, स्री सुकदेव गुसाईँ ।
जैसे और पतित घन३ तारे, चरनदास की गहियो बाहीं ॥५
(२)
राखो जी लाज गरीब-निवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारै, सबही बिगरे काज ॥ १ ॥
(१) साथ । (२) कीर्ति, प्रण । (३) घने, अनेक ।
चरनदासजी १८५
भक्त वछल हरि नाम कहावो, पतित उधारनहार ।
करो मनोरथ पूरन जन की, सीतल दृष्टि निहार ॥ २ ॥
तुम जहाज़ मैं काग तिहारो, तुम तजि अंत न जाऊँ ।
जो तुम हरि जू मारि निकासो, और ठौर नहिं पाऊँ ॥३॥
चरनदास प्रभु सरन तिहारी, जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तुम्हारी, तुम हूँ देखु बिचार ॥४॥
॥ उपदेश ॥
सोई सोहागिल नारि, पिया मन भावई ।
अपने घर को छोड़ि, न पर घर जावई ॥ १ ॥
अपने पिय का भेद, न काहू दीजिये ।
तन मन सुरति लगाय के, सेवा कीजिये ॥ २ ॥
पति की आज्ञा चाल पाल, पिय को कहो ।
लाज लिये कुलवंत, जतन हीँ सूँ रहो ॥ ३ ॥
धन धनि हैँ जग माहिँ, पुरुष बहु हित धरै ।
सब सूँ नायक¹ होय जो, सिर बर² को करै ॥ ४ ॥
पिय कूँ चाहो रूप, सिंगार बनाइये ।
पतिव्रता कुल दोय मैं, सोभा पाइये ॥ ५ ॥
नौधा बस्तर पहिरि, दया रँग लाल है ।
भूखन बस्तर धारि, बिचित्तर बाल है ॥ ६ ॥
रंगमहल निर्दोष, वहँ झिलमिल नूर है ।
निरगुन सेज बिछाय, सभी करि दूर भै³ ॥ ७ ॥
मंदिर दीपक बारि, बिन बाती घीव की ।
सुघर चतुर गुन रासि, लाड़िली पीव को ॥ ८ ॥
कहैँ गुरू सुकदेव, यौँ बालम मोहिये ।
चरनदास ले सखी, जो प्रेम समोहिये ॥ ९ ॥
(१) बड़ी । (२) पति । (३) भय, डर ।
२४
१८६ शब्द संग्रह
॥ ब्राह्मन ॥
ब्राह्मन सो जो ब्रह्म पिछानै, बाहर जाता भीतर आनै ॥१॥
पाँचौ बस करि झूठ न भाखै, दया जनेऊ हिरदे राखै ॥२॥
आतम बिद्या पढ़े पढ़ावै, परमातम का ध्यान लगावै ॥३॥
काम क्रोध मद लोभ न होई, चरनदास कहै ब्राह्मन सोई ॥४॥
॥ मिश्रित ॥
बसंत
मेरे सतगुरु खेलत नित बसंत ।
जा की महिमा गावत साध संत ॥ १ ॥
ज्ञान बिबेक के फूले फूल ।
जहाँ साखा जोग अरु भक्ति मूल ॥ २ ॥
प्रेम लता जहाँ रही झूल ।
सत संगति सागर के कूल ॥ ३ ॥
जहाँ धर्म उड़त है ज्योँ गुलाल ।
अरु चोवा चरचै निश्चै बाल ॥ ४ ॥
जहाँ सील छिमा को बरसै रंग ।
काम क्रोध को मान भंग ॥ ५ ॥
हरि चरचा जित है अनंत ।
सुनि मुक्त होत सब जीव जंत ॥ ६ ॥
आन धर्म सब जाहिँ खोय ।
राम नाम की जैजै होय ॥ ७ ॥
जहाँ अपने पिय कूँ ढूँढ़ि लेव ।
अरु चरन कँवल में सुरति देव ॥ ८ ॥
कहै चरनदास दुख दुंद जाहिँ ।
जब प्रीतम सुकदेव गहैँ बाँहिँ ॥ ६ ॥
चतुर्थ भाग: मलूकदास, दरिया साहिब, चरनदास एवं संतबानी संग्रह उपसंहार
बुल्ले शाह
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १५१ ]
॥ चितावनी ॥
(१)
अब तो जाग मुसाफर प्यारे, रैन घटी लटके सब तारे ॥टेक
आवागौन सराइँ डेरे, साथ तयार मुसाफर तेरे ।
अजे१ न सुन दा कूच नगारे ॥ १ ॥
कर लै आज करन दी वेला२, बहुरि न होसी आवन तेरा।
साथ तेरा चल चल्लु पुकारे ॥ २ ॥
आपो अपने लाहे३ दौड़ी, क्या सरधन क्या निरधन बौरी।
लाहा नाम तू लेहु सँभारे ॥ ३ ॥
बुल्ले सहु४ दी पैरी परिये, गफलत छोड़ हीला५ कुछ करिये ।
मिरग जतन बिन खेत उजारे ॥ ४ ॥
(२)
माटी खुदी करैंदी यार ॥ टेक ॥
माटी जोड़ा माटी घोड़ा, माटी दा असवार ॥ १ ॥
माटी माटी नूँ मारन लागी, माटी दे हथियार ॥ २ ॥
जिस माटी पर बहुती माटी, तिस माटी हंकार ॥ ३ ॥
माटी बाग बगीचा माटी, माटी दी गुलजार ॥ ४ ॥
माटी माटी नूँ देखन आई, माटी दी बहार ॥ ५ ॥
हंस खेल फिर माटी होई, पैंदी६ पाँव पसार ॥ ६ ॥
बुल्ले शाह बुझारत७ बूझी, लाह सिरौँ भौँ मार८ ॥ ७ ॥
(१) अब भी । (२) समय, अवसर । (३) लाहा=लाभ । (४) ख़ाविन्द ।
(५) कोशिश, जतन। (६) पड़ जायगो । (७) बूझ। (८) सिर से बोझ [लाह] उतार
कर ज़मीन [भौँ] पर पटक दिया।
१८८ शब्द संग्रह
॥ विरह ॥
कद मिलसी मैं बिरहौँ सताई नूँ ॥ टेक ॥
आप न आवे नाँ लिख भेजे, भट्ठि अजे ही लाई नूँ१॥१॥
तैं जेहा२ कोइ होर३ नाँ जाणा, मैं तनि सूल सवाई नूँ ॥२॥
रात दिनैं आराम न मैं नूँ, खावे बिरह कसाई नूँ ॥३॥
बुल्ले साह धृग४ जीवन मेरा, जौँ लग दरस दिखाई नूँ ॥४॥
॥ प्रेम ॥
(१)
घूँघट चक५ प्यारे, हुन६ सरमाँ केहियाँ रखियाँ वे७ ॥टेक॥
प्रीत लगा के मन हर लीना, फिर तैं अपना दरस न दीना ।
जहर पियाला आपे पीना, सी मैं अक्कलोँ कच्चियाँ वे८ ॥१॥
ज़ुलफ कुँडल ने घेरा पाया, बिसियर९ हो के डंक चलाया ।
तै नूँ देख तरस ना आया, मैं इसक तेरे ने पटियाँ वे१० ॥२॥
प्रेम कटारी कस कर मारी, हुन मैं होइयाँ बेदल११ भारी ।
तैँ ताँ सार१२ न लई हमारी, लाके खूनी अँखियाँ वे ॥३॥
दो नैनाँ दा तीर चलाया, मुझ आजिज१३ दे सीने लाया ।
घायल करके मुख छपाया, (तैनूँ) एह चोरियाँ किन दसियाँ१४ वे ॥४॥
मैं बंदी दा जे तू साईँ, कदी तो आवीँ फेरा पाँईँ ।
मिहर करीँ ते मुख दिखलाई, मैं काग उड़ाँदी थक्कियाँ वे ॥५
बुल्ले साह मैं मुखौँ न बोलाँ, हर सूरत बिच तैनूँ टोलाँ१५ ।
साईँ लोकाँ भेद न खोलाँ, डर दी आख१६ न सकियाँ वे ॥६
(१) व्यर्थ ऐसी प्रीत लगाई । (२) जैसा । (३) और । (४) धिक्कार है ।
(५) हटाओ । (६) अब । (७) हम से क्यों शर्म करते हो। (८) मैं अनसमझ थी ।
(९) ज़हरीला कीड़ा, बिच्छू । (१०) मैं तेरे इश्क़ में उजड़ गई । (११) अधीर ।
(१२) सुध, ख़बर । (१३) दीन । (१४) सिखलाया । (१५) ढूँढ़ा । (१६) बोल ।
बुल्ले शब्द १८६
(२)
ओल्हे वह वह झाकी दा, हुन पड़दा किस तैँ राखीदा ॥टेक१
जिस तन इसक दा जौर हुआ, वह वेखुद हो बेहोस हुआ।
वह क्यौंकर रहे खमोस हुआ, जिन प्याला पीता साकी२ दा १
तुसीँ आप असाँवल३ आये हो, किस कोलोँ४ भेद छपाये हो।
किते५ आदम६ पीर७ बन आये हो, बिच पड़दा रखिया खाकी८ दा ॥२॥
तुसीँ आपे कहँदे सारे हो, तुसीँ आपे कहँदे न्यारे हो ।
तुसीँ आपे लई नजारे हो, किते ला ला नैन झमाकी दा ॥३॥६
तू ना कर इतना भेड़ा है, तुझ बाझौँ दूजा केहड़ा है ।
असाँ देख्या बड़ा अँधेरा है, अपने आप नूँ दूजा आखी दा॥४॥१०
किते रूमी हो किते सामी हो, तुसीँ आपने आप तमामी११ हो
किते साहिब किते सलामी१२ हो, कीन्हूँ खोटा खरा सुलाकी१३ दा॥५
मनसूर नूँ सूली चढ़ा है, साह सम्मस पोस उतारा है१४।
हुन मिसकीनाँ वल आया है, कुछ लेखा रहिँदा बाक़ी दा१५, ६
बुल्ले इस तन दी तू भाठी कर, बाल हड्डाँ नूँ काठी कर१६।
ज्ञान अगन सौँ ताती कर, फिर तिस पर मधुआ१७ चाखीदा७
(१) छिप कर [ओल्हे] बैठे बैठे [वह वह] दर्शन देते है। अब किस से
परदा रखते हो। (२) शराब पिलाने वाला अर्थात् प्रीतम । (३) अपने से।
(४) से। (५) कहीँ। (६) बड़े । (७) गुरू । (८) मिट्टी अर्थात् तन । (६) तुम्हीं
आप सब मैं बोलते हो और तुम्हीं अलग बोलते हो, तुम्हीं आप
झमकड़ा मार कर दर्शन देते हो। (१०) तू इतना झगड़ा मत कर हमें तेरे
बिन [बाझो] दूसरा [दूजा] कौन [केहड़ा] है, पर हम घोर अंधकार मैं पड़े हुए
हैं कि अपने को तुझ से न्यारा समझते ह । (११) समस्त । (१२) सलाम करने
वाले । (१३) टॉकी दिया हुआ सिक्का । (१४) शम्स तबरेज़ जिन्हों ने अपनी खाल
[पास] आप उतार दी थी। (१५) अब हम आधीन की ओर [ वल ] बाक़ी
हिसाब चुकाने को आया है। (१६) हड्डियों को लकड़ी [काठी] की तरह जला
[ बाल ] दे। (१७) शराब ।
१६० शब्द संग्रह
(३)
मन अटक्या बेपरवाहे नाल ॥ टेक ॥
नैन फँसे दिल मिलया लोड़े, मूरख लोक असानूँ मोड़े।
मेरा हर दम जाँदा आहे नाल ॥ १ ॥१
मुल्लाँ काजी नमाज पढ़ावन, हुकम सरा दा भय दिखलावन ।
साडे इसक नूँ की सरा दे नाल ॥ २ ॥२
नदियाँ पार सजन दा ठाना, कीते कौल जरूरी जाना ।
कुछ करले सलाह मलाहे नाल ॥ ३ ॥३
आसिक सोई जेहड़ा४ इसक कमावे, जित वल५ प्यारा उते वल जावे ।
बुल्ले साह जा मिल तू अलाहे६ नाल ॥४॥
॥ उपदेश ॥
टुक बूझ कवन छप आया है ।
इक नुकते मैं जो फेर पड़ा, तब ऐन गैन७ का नाम धरा ।
जब मुरसद नुकता दूर किया, तब ऐनाँ ऐन८ कहाया है ॥१॥
तुसीं इलम किताबाँ पढ़दे हो, केहे उलटे माने९ करदे हो ।
बेमूजब ऐवैं लड़दे हो, केहा१० उलटा बेद पढ़ाया है ॥२॥
दुई दूर करो कोई सोर नहीं, हिंदू तुरक कोइ होर११ नहीं।
सब साधु लखो कोइ चोर नहीं, घट घट मैं आप समाया है३॥
(१) मेरी आँखें प्रीतम से लग गई हैं और दिल मिलने को तरसता है, मूरख
लोग बरजते हैं [मोड़े] पर मेरी हर साँस आह के साथ निकलती है।
(२) क़ाज़ी मुल्ला नमाज़ पढ़ने को कहते हैं और शरअ [मुसलमानों के कर्मकांड]
के हुकम का डर दिखलाते हैं लेकिन हमारे इश्क़ को शरअ की क्या परवाह है।
(३) हमारे प्रीतम का स्थान [ठाना] भवसागर के पार है उसको बचन दिया
है कि ज़रूर आऊँगा तो अब केवट अर्थात सतगुरु से सलाह करले । (४) जो ।
(५) तरफ़ । (६) अल्लाह के । (७) फ़ारसी हर्फ़ों मैं ऐन [ع] पर एक नुक़ता
लगा देने से ग़ैन [غ] हो जाता है। (८) आँख । (९) अर्थ । (१०) किसने ।
(११) और, न्यारे न्यारे ।
काफ़ियाँ १६१
ना मैं मुल्ला ना मैं काजी, ना मैं सुन्नी ना मैं हाजी ।
बुल्ले साह नाल लाई¹ बाजी, अनहद सबद बजाया है ॥४॥
सहजो बाई
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी-संग्रह भाग १ पृष्ठ १५४]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
हमारे गुरु पूरन दातार ।
अभय दान दीनन को दीन्हे, किये भवजल पार ॥ १ ॥
जन्म जन्म के बंधन काटे, जम की बंध निवार ।
रंक हुते सो राजा कीन्हे, हरि धन दियौ अपार ॥ २ ॥
देवैं ज्ञान भक्ति पुनि देवैं, जोग बतावनहार ।
तन मन बचन सकल सुखदाई, हिरदे बुधि उँजियार ॥३॥
सब दुख-गंजन पातक-भंजन, रंजत ध्यान विचार ।
साजन दुर्जन जो चलि आवै, एकहि दृष्टि निहार ॥ ४ ॥
आनंद रूप सरूप-मई है, लिप्त नहीं संसार ।
चरनदास गुरु सहजो केरे, नमो नमो बारम्बार ॥ ५ ॥
(२)
राम तजूँ पै गुरु न बिसारूँ, गुरु के सम हरि कूँ न निहारूँ ॥१
हरि ने जन्म दियो जग माहीं, गुरु ने आवागवन छुटाहीं २
हरि ने पाँच चोर दिये साथा, गुरु ने लई छुटाय अनाथा ३
हरि ने कुटुंब जाल मैं गेरी, गुरु ने काटी ममता चेरी² ॥४
हरि ने रोग भोग उरझायौ, गुरु जोगी करि सबै छुटायौ ॥५
हरि ने कर्म धर्म भरमायौ, गुरु ने आतम रूप लखायौ ॥६
(१) लगाई। (२) बेड़ी।
१६२ शब्द संग्रह
हरि ने मो सूं आप छिपायौ, गुरु दीपक दै ताहि दिखायौ॥७
फिर हरि बंध-मुक्ति१ गति लाये, गुरु ने सबही भर्म मिटाये८
चरनदास पर तन मन वारूँ, गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ॥९
॥ चितावनी ॥
(१)
पानी का सा बुलबुला, यह तन ऐसा होय ।
पीव मिलन की ठानिये, रहिये ना पड़ि सोय ॥
रहिये ना पड़ि सोइ, बहुरि नहिं मनुखा देही ।
आपन ही कूँ खोजु, मिलै तब राम सनेही ॥
हरि कूँ भूले जो फिरैं, सहजो जीवन छार ।
सुखिया जब ही होयगो, सुमिरैगो करतार ॥
(२)
चौरासी भुगती घनी, बहुत सही जम मार ।
भ्रमि फिरे तिहुँ लोक मैं, तहू न मानी हार ॥
तहू न मानी हार, मुक्ति की चाह न कीन्ही ।
हीरा दँही पाइ, मोल माटी के दीन्ही ॥
मूरख नर समुझै नहीं, समुझाया बहु बार ।
चरनदास कहैं सहजिया, सुमिरै ना करतार ॥
॥ प्रेम ॥
मुकट लटक अटकी मन माहीं ।
निरतत२ नटवर मदन मनोहर, कुंडल झलक पलक बिथुराई१
नाक बुलाक हलत मुक्ताहल, होठ मटक गति भौंह चलाई।
ठुमक ठुमक पग धरत धरनि पर, बाँह उठाय करत चतुराई२
झुनक झुनक नूपुर झनकारत, तताथेई थेई रीझ रिझाई।
चरनदास सहजो हिये अंतर, भवन करौ जित रहौ सदाई३
(१) ऐसी मुक्ति जिसमें झीनी माया का बंधन लगा रहता है। (२) नाचते हैं।
सहजो बाई १६३
॥ विनय ॥
(१)
अब तुम अपनी ओर निहारो।
हमरे औगुन पै नहिँ जावो, तुमहीँ अपनी विरद सम्हारो १
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, वेद पुरानन गाई।
पतित-उधारन नाम तुम्हारी, यह सुन केमन दृढ़ता आई २
मैं अजान तुम सब कछु जानो, घट घट अंतरजामी।
मैं तो चरन तुम्हारे लागो, हौ किरपाल दयालहि स्वामी ३
हाथ जोरि के अरज करत हौँ, अपनाओ गहि बाँहौँ।
द्वार तिहारे आय परी हौँ, पौरुष गुन मो मैं कछु नाहीँ ४
चरनदास सहजिया तेरी, दरसन की निधि पाऊँ।
लगन लगी और प्रान अड़े हैं, तुम को छोड़ि कहो कित जाऊँ ५
(२)
हम बालक तुम माय हमारी, पल पल माहिँ करो रखवारी १
निस दिन गोदी ही मैं राखो, इत उत बचन चितावन भाखो २
विषै ओर जाने नहिँ देवो, दुरि दुरि जाऊँ तो गहि गहि लेवो ३
मैं अनजान कछू नहिँ जानूँ, बुरी भली को नहिँ पहिचानूँ ४
जैसी तैसी तुमहीँ चीन्हेव, गुरु ह्वै ध्यान खिलौना दीन्हेव ५
तुम्हरी रच्छा ही से जीऊँ, नाम तुम्हारो अमृत पीऊँ ॥६
दृष्टि तिहारी ऊपर मेरे, सदा रहूँ मैं सरनै तेरे ॥७॥
मारौ झिड़कौ तौ नहिँ जाऊँ, सरकि सरकि तुमहीँ पै आऊँ ८
चरनदास है सहजो दासी, हौ रच्छक पूरन अबिनासी ।८
॥ उपदेश ॥
सो बसंत नहिँ बार बार। तैँ पाई मानुष देह सार ॥१॥
यह औसर बिरथा न खोव। भक्ति बीज हिये धरती बोव २
सतसंगत को सीँच नीर। सतगुरु जी सौँ करौ सीर॥३॥
२५
१६४ शब्द संग्रह
नीकी बार बिचार देव । परन राखि या कूँ जु सेव ॥४॥
रखवारी करु हेत हेत । जब तेरी होवै जैत जैत ॥५॥
खोट कपट पंछी उड़ाव । मोह प्यास सबही जलाव ॥६॥
सँभलै बाड़ी नऊ अंग । प्रेम फूल फुलै रंग रंग ॥७॥
पुहुप गूँध माला बनाव । आदि पुरुष कूँ जा चढ़ाव ॥८॥
तौ सहजो बाई चरनदास । तेरे मन की पुरवैँ सकल आस९
दया बाई
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १६७ ]
गुरु बिन ज्ञान ध्यान नहिँ होवै ।
गुरु बिन चौरासी मग जोवै ॥ १ ॥
गुरु बिन राम भक्ति नहिँ जागै ।
गुरु बिन असुभ कर्म नहिँ त्यागै ॥ २ ॥
गुरु ही दीन-दयाल गुसाईँ ।
गुरु सरनै जो कोई जाई ॥ ३ ॥
पलटैँ करैँ काग सूँ हंसा ।
मन को मेटत हैं सब संसा ॥ ४ ॥
गुरु हैं सब देवन के देवा ।
गुरु को कोउ न जानत भेवा ॥ ५ ॥
करुना-सागर कृपा-निधाना ।
गुरु हैं ब्रह्म रूप भगवाना ॥ ६ ॥
दै उपदेस करैँ भ्रम नासा ।
“दया” देत सुख-सागर बासा ॥ ७ ॥
गरीबदास जी २७५
गुरु को अहि निसि१ ध्यान जो करिये ।
विधिवत सेवा मैं अनुसरिये२ ॥ ८ ॥
तन मन सूँ आज्ञा मैं रहिये ।
गुरु आज्ञा बिन कछू न करिये ॥ ९ ॥
———
गरीबदास जी
[संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १८१ ]
—:०:—
॥ चितावनी ॥
(१)
सुनिये संत सुजान, गरब नहिँ करना रे ॥ टेक ॥
चार दिनाँ की चिहर३ बनी है, आखिर तो कूँ मरना रे॥१
तू जाने मेरि ऐसी निभेगी, हर दम लेखा भरना रे ॥२॥
खाय ले पी ले बिलस ले हंसा, जोरि जोरि नहिँ धरना रे ॥३
दास गरीब सकल मैं साहिब, नहीं किसी सूँ अड़ना रे॥४
अरिल
(२)
मरदाने मरि जाहिँ मनी पर मार है ।
ऐसा महल अनूप पलक मैं छार है ॥ १ ॥
जोरा४ बुरी बलाय जीव जग भूँच५ है ।
पलक पहर छिन माहिँ नगारा कूँच है ॥ २ ॥
सुरत सोहंगम नेस पेस है बावरे ।
बदी बिदारो६ बेग धनी कूँ ध्याव रे ॥ ३ ॥
———
(१) दिन रात । (२) लगिये । (३) चिड़ियों के किलोल की जगह जो साँझ पड़े
बसेरे को उड़ जाती ह । (४) जुल्म । (५) गँवार । (६) फाड़ डालो, नाश करौ ।
१६६ शब्द संग्रह
दम को डोरा खोज दरीबा¹ खूब है ।
अगर दीप सतलोक अजब महबूब है ॥ ४ ॥
सुता² पुत्र गृह नारि छार सब गात रे ।
का सूँ लाया नेह संग नहिँ साथ रे ॥ ५ ॥
हंस अकेला जाय हिरंबर हेत रे ।
सबद हमारा मान नाम निज चेत रे ॥ ६ ॥
कोतल घोड़े पीनस³ रथ सँग पालकी ।
गज गैबर⁴ दल ठाठ निसानी काल की ॥ ७ ॥
हक हलाल पहिचान बदी कर दूर रे ।
यह मुरगी रब रूह गऊ क्या सूर⁵ रे ॥ ८ ॥
तीतर चिड़ी बटेर भखे हलवान रे ।
मुल्ला बाँग पुकार अलह रहमान रे ॥ ६ ॥
रंमजानी रमजान घास चोखा दिया ।
पकड़ पछाड़ी रूह कहो यह क्या किया ॥ १० ॥
खूनी खून मँझार खाल क्यूँ काढ़ता ।
देखै रब रहमान गला क्यूँ बाढ़ता⁶ ॥ ११ ॥
ऐसे बूड़ै नाव होत हैं गरक रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब नाम निज परख रे ॥१२
अरिल
(३)
यह सौदा सतभाय⁷ करो परभात रे ।
तन मन रतन अमोल बटाऊ⁸ साथ रे ॥ १ ॥
बिछुर जायँगे मीत मता सुन लीजिये ।
बहुर न मेला होय कहो क्या कीजिये ॥ २ ॥
(१) झोपड़ा । (२) बेटी । (३) एक तरह की छोटी पालकी । (४) हाथियों का
झुंड । (५) सूअर । (६) काटता । (७) सत्त भाव । (८) डाकू ।
गरीबदास जी १८७
सील संतोप बिबेक दया के धाम हैं ।
ज्ञान रतन गुलजार सँघाती राम हैं ॥ ३ ॥
धरम धजा फरकंत फरहरै लोक रे ।
ता मध अजपा नाम सु सौदा रोक१ रे ॥ ४ ॥
चलै बनिजवा२ ऊठ३ हूँठ गढ़ छोड़ रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब लगे जम डाँड़ रे ॥५॥
॥ बेहद ॥
अरिल छंद
(१)
बिना मूल अस्थूल, गगन में रमि रहा ।
कोई न जाने भेव, सकल सच भ्रमि रहा ॥ १ ॥
अच्छै बृच्छ बिस्तार, अपार अजोख है ।
नहीं गाम नहिं धाम, भुक्त नहिं मोख है ॥ २॥
छत्र_ सिंघासन सेत, पुरुष का रूप है ।
वरन अवरन बिचार, न छाया धूप है ॥ ३॥
देख पदम उँजियार, परख नहिं आवहीं ।
करम लिखा सो होय, टरै नहिं भावहीँ४ ॥ ४ ॥
अविगत पूरन ब्रह्म, परम परवान रे ।
हरे हाँ रे कहता दास गरीब, सबद पहिचान रे ॥५॥
॥ विनय ॥
दीन के दयाल, भक्ति बिर्द५ दीजिये ।
खानाजाद गुलाम, अपन कर लीजिये ॥ १ ॥
खानाजाद गुलाम, तुम्हारा है सही ।
मिहरबान महबूब, जुगन जुग पत रही ॥ २ ॥
(१) नक़्द दाम से मिलने का । (२) बंजारा, प्राण । (३) उठना । (४) भावी=होन-
हार । (५) साख, वरदान ।
१६८ शब्द संग्रह
बाँदी-जाद१ गुलाम, गुलाम गुलाम है।
खड़ा रहै दरबार, सु आठो जाम है॥३॥
सेवक तलबदार२, तुम्हरे दर कूकहीँ।
औगुन अनँत अपार, परी मोहिँ चूक हीँ॥४॥
मैं घर का बन्दाजादा, अरज मेरि मानिये।
कहता दास गरीब, अपन कर जानिये॥५॥
॥ साध महिमा ॥
सोई साध अगाध है, आपा न सरावै३।
पर-निंदा नहिँ संचरै, चुगली नहिँ खावै॥१॥
काम क्रोध त्रिसना नहीं, आसा नहिँ राखै।
साचे सूँ परचा भया, जब कूड न भाखै॥२॥
एकै नजर निरंजना, सबही घट देखै।
ऊँच नीच अंतर नहीं, सब एकै पेखै॥३॥
सोई साध सिरोमनी, जप तप उपकारी।
भूले कूँ उपदेस दे, दुर्लभ संसारी॥४॥
अकल४ यकीन पठाय दे, भूले कूँ चेतै।
सो साधू संसार मैं, हम बिरले भँटै॥५॥
सूतक५ खोवै सत कहै, साचे सूँ लावै।
सो साधू संसार मैं, हम बिरले पावै॥६॥
निरख निरख पग धरत हैं, जिव हिंसा नाहीं।
चौरासी तारन तरन, आये जग माहीं॥७॥
इस सौदे कूँ उतरे, सौदागर सोई।
भरे जहाज उतारि दे, भौसागर लोई॥८॥
(१) लौंडी-बच्चा। (२) तनख़ाह पाने वाले। (३) सराह्रै। (४) बुद्धि।
(५) अशुद्धता।