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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 267 में से

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पृष्ठ 202

सहजो बाई १६३
॥ विनय ॥
(१)
अब तुम अपनी ओर निहारो।
हमरे औगुन पै नहिँ जावो, तुमहीँ अपनी विरद सम्हारो १
जुग जुग साख तुम्हारी ऐसी, वेद पुरानन गाई।
पतित-उधारन नाम तुम्हारी, यह सुन केमन दृढ़ता आई २
मैं अजान तुम सब कछु जानो, घट घट अंतरजामी।
मैं तो चरन तुम्हारे लागो, हौ किरपाल दयालहि स्वामी ३
हाथ जोरि के अरज करत हौँ, अपनाओ गहि बाँहौँ।
द्वार तिहारे आय परी हौँ, पौरुष गुन मो मैं कछु नाहीँ ४
चरनदास सहजिया तेरी, दरसन की निधि पाऊँ।
लगन लगी और प्रान अड़े हैं, तुम को छोड़ि कहो कित जाऊँ ५
(२)
हम बालक तुम माय हमारी, पल पल माहिँ करो रखवारी १
निस दिन गोदी ही मैं राखो, इत उत बचन चितावन भाखो २
विषै ओर जाने नहिँ देवो, दुरि दुरि जाऊँ तो गहि गहि लेवो ३
मैं अनजान कछू नहिँ जानूँ, बुरी भली को नहिँ पहिचानूँ ४
जैसी तैसी तुमहीँ चीन्हेव, गुरु ह्वै ध्यान खिलौना दीन्हेव ५
तुम्हरी रच्छा ही से जीऊँ, नाम तुम्हारो अमृत पीऊँ ॥६
दृष्टि तिहारी ऊपर मेरे, सदा रहूँ मैं सरनै तेरे ॥७॥
मारौ झिड़कौ तौ नहिँ जाऊँ, सरकि सरकि तुमहीँ पै आऊँ ८
चरनदास है सहजो दासी, हौ रच्छक पूरन अबिनासी ।८
॥ उपदेश ॥
सो बसंत नहिँ बार बार। तैँ पाई मानुष देह सार ॥१॥
यह औसर बिरथा न खोव। भक्ति बीज हिये धरती बोव २
सतसंगत को सीँच नीर। सतगुरु जी सौँ करौ सीर॥३॥
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