संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुल्ले शब्द १८६
(२)
ओल्हे वह वह झाकी दा, हुन पड़दा किस तैँ राखीदा ॥टेक१
जिस तन इसक दा जौर हुआ, वह वेखुद हो बेहोस हुआ।
वह क्यौंकर रहे खमोस हुआ, जिन प्याला पीता साकी२ दा १
तुसीँ आप असाँवल३ आये हो, किस कोलोँ४ भेद छपाये हो।
किते५ आदम६ पीर७ बन आये हो, बिच पड़दा रखिया खाकी८ दा ॥२॥
तुसीँ आपे कहँदे सारे हो, तुसीँ आपे कहँदे न्यारे हो ।
तुसीँ आपे लई नजारे हो, किते ला ला नैन झमाकी दा ॥३॥६
तू ना कर इतना भेड़ा है, तुझ बाझौँ दूजा केहड़ा है ।
असाँ देख्या बड़ा अँधेरा है, अपने आप नूँ दूजा आखी दा॥४॥१०
किते रूमी हो किते सामी हो, तुसीँ आपने आप तमामी११ हो
किते साहिब किते सलामी१२ हो, कीन्हूँ खोटा खरा सुलाकी१३ दा॥५
मनसूर नूँ सूली चढ़ा है, साह सम्मस पोस उतारा है१४।
हुन मिसकीनाँ वल आया है, कुछ लेखा रहिँदा बाक़ी दा१५, ६
बुल्ले इस तन दी तू भाठी कर, बाल हड्डाँ नूँ काठी कर१६।
ज्ञान अगन सौँ ताती कर, फिर तिस पर मधुआ१७ चाखीदा७
(१) छिप कर [ओल्हे] बैठे बैठे [वह वह] दर्शन देते है। अब किस से
परदा रखते हो। (२) शराब पिलाने वाला अर्थात् प्रीतम । (३) अपने से।
(४) से। (५) कहीँ। (६) बड़े । (७) गुरू । (८) मिट्टी अर्थात् तन । (६) तुम्हीं
आप सब मैं बोलते हो और तुम्हीं अलग बोलते हो, तुम्हीं आप
झमकड़ा मार कर दर्शन देते हो। (१०) तू इतना झगड़ा मत कर हमें तेरे
बिन [बाझो] दूसरा [दूजा] कौन [केहड़ा] है, पर हम घोर अंधकार मैं पड़े हुए
हैं कि अपने को तुझ से न्यारा समझते ह । (११) समस्त । (१२) सलाम करने
वाले । (१३) टॉकी दिया हुआ सिक्का । (१४) शम्स तबरेज़ जिन्हों ने अपनी खाल
[पास] आप उतार दी थी। (१५) अब हम आधीन की ओर [ वल ] बाक़ी
हिसाब चुकाने को आया है। (१६) हड्डियों को लकड़ी [काठी] की तरह जला
[ बाल ] दे। (१७) शराब ।