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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 267 में से

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चरनदासजी १८१
मतवारे ज्यौं सबद समाये, अंतर भींज कनी ।
करम भरम के बंधन छूटे, दुबिधा त्रिपत्ति हनी ॥३॥
आपा बिसरि जक्त कूँ बिसरो, कित रहिं पाँच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञान गुनी ॥४॥
हो तहँ लीन चरनहीं दासा, कहैं सुकदेव मुनी ।
ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै सिखर अनी¹ ॥५॥
॥ चितावनी ॥
(१)
अरे नर हरि का हेत न जाना ।
उपजाया सुमिरन के काजे, तैं कछु औरै ठाना ॥१॥
गर्भ माहिँ जिन रच्छा कीन्ही, ह्वाँ खाने कूँ दीन्हा ।
ज़ठर अगिन सोँ राखि लियो है, अँग संपूरन कीन्हा ॥२॥
बाहर आय बहुत सुधि लीन्ही, दसन² बिना पय प्यायो।
दाँत भये भोजन बहु भाँती, हित सोँ तोहिँ खिलायो ॥३॥
और दिये सुख नाना बिधि के, समुझि देखु मन माहीं ।
भूलो फिरत महा गर्वायो, तू कछु जानत नाहीं ॥४॥
तुव कारन सब कछु प्रभु कीन्हो, तू कीन्हा निज काजा ।
जग व्यौहार पगे ही बोले, तोहि न आवै लाजा ॥५॥
अजहूँ चेत उलट हरि साँही³, जन्म सुफल करु भाई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुमिरन है सुखदाई ॥६॥
(२)
कछु मन तुम सुधि राखौ वा दिन की ।
जा दिन तेरी देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की ॥१॥
जिन के संग बहुत सुख कीन्हे, मुख ढकि ह्वैहैं न्यारे ।
जम का त्रास होय बहु भाँती, कौन छुटावनहारे ॥२॥
(१) नोक । (२) दाँत । (३) ओर, तरफ़ ।