संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८८ सब्द संग्रह
गुरु सुकदेव दया केरैँ, हेली मोहिँ मिलावैँ काल ।
चरनदास दुख सब भजैँ, हेली सदा रहूँ पति नाल१ ॥५॥
॥ प्रेम ॥
गुरु हमरे प्रेम पियायो हो ।
ता दिन तैं पलटो भयो, कुल गोल नसायो हो ॥ १ ॥
अमल चढ़ो गगनै लगो, अनहद मन छायो हो ।
तेज पुंज की सेज पै, प्रीतम गल लायो हो ॥ २ ॥
गये दिवाने देसड़े, आनंद दरसायो हो ।
सब किरिया सहजै छुटी, तप नेम भुलायो हो ॥ ३ ॥
त्रैगुन तैं ऊपर रहूँ, सुकदेव बसायो हो ।
चरनदास दिन रैन नहिं, तुरिया पद पायो हो ॥ ४ ॥
॥ बिनती ॥
पतित उधारन बिरद² तुम्हारे ।
जो यह बात साच है हरि जू, तौ तुम हम कूँ पार उतारे ॥१
बालपने औ तरुन अवस्था, और बुढ़ापे माहीं ।
हम से भई सभी तुम जानौ, तुम से नेक छिपानी नाहीं ॥२
अनगिन पाप भये मनमाने, नखसिख औगुन धारी ।
फिरिफिरि कै तुम सरनै आयौ, अब तुम को है लाज हमारी ॥३
सुभ करमन को मारग छूटो, आलस निद्रा घेरो ।
एकहिँ बात भली बनि आई, जग में कहायो तेरो चेरो ॥४
दीनदयाल कृपाल बिसंभर, स्री सुकदेव गुसाईँ ।
जैसे और पतित घन३ तारे, चरनदास की गहियो बाहीं ॥५
(२)
राखो जी लाज गरीब-निवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारै, सबही बिगरे काज ॥ १ ॥
(१) साथ । (२) कीर्ति, प्रण । (३) घने, अनेक ।