संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचरनदासजी १७६
कोटि बिस्नु अनंत ब्रह्मा, सदा सिव जेहि ध्यावहीं।
सोइ मिला सहज सरूप केसो, अनँद मंगल गावहीं॥१२॥
चरनदासजी
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतवानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १४२]
॥ गुरुदेव ॥
(१)
गुरु बिन और न जान, मान मेरा कहो।
चरनदास उपदेस, विचारत ही रहो ॥१॥
बेद रूप गुरु होहिं, कि कथा सुनावहीं।
पंडित को धरि रूप, कि अर्थ बतावहीं ॥२॥
कल्पवृच्छ गुरुदेव, मनोरथ सब सरैं।
कामधेनु गुरुदेव, छुधा तृस्ना हरैं ॥३॥
गुरु ही सेस महेस, तोहि चेतन करैं।
गुरु ब्रह्मा गुरु बिस्नु, हाथ खाली भरैं ॥४॥
गंगा सम गुरु होय, पाप सब धोवहीं।
सूरज सम गुरु होय, तिमिर हरि¹ लेवहीं ॥५॥
गुरु ही को करु ध्यान, नाम गुरु को जपौ।
आपा दीजै भेंट, पुजन गुरु ही थपौ ॥६॥
समरथ खो सुकदेव, कहा महिमा करौं।
अस्तुति कही न जाय, सीस चरनन धरौं ॥७॥
(१) खींच।