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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 267 में से

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पृष्ठ 194

चरनदासजी १८५
भक्त वछल हरि नाम कहावो, पतित उधारनहार ।
करो मनोरथ पूरन जन की, सीतल दृष्टि निहार ॥ २ ॥
तुम जहाज़ मैं काग तिहारो, तुम तजि अंत न जाऊँ ।
जो तुम हरि जू मारि निकासो, और ठौर नहिं पाऊँ ॥३॥
चरनदास प्रभु सरन तिहारी, जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तुम्हारी, तुम हूँ देखु बिचार ॥४॥
॥ उपदेश ॥
सोई सोहागिल नारि, पिया मन भावई ।
अपने घर को छोड़ि, न पर घर जावई ॥ १ ॥
अपने पिय का भेद, न काहू दीजिये ।
तन मन सुरति लगाय के, सेवा कीजिये ॥ २ ॥
पति की आज्ञा चाल पाल, पिय को कहो ।
लाज लिये कुलवंत, जतन हीँ सूँ रहो ॥ ३ ॥
धन धनि हैँ जग माहिँ, पुरुष बहु हित धरै ।
सब सूँ नायक¹ होय जो, सिर बर² को करै ॥ ४ ॥
पिय कूँ चाहो रूप, सिंगार बनाइये ।
पतिव्रता कुल दोय मैं, सोभा पाइये ॥ ५ ॥
नौधा बस्तर पहिरि, दया रँग लाल है ।
भूखन बस्तर धारि, बिचित्तर बाल है ॥ ६ ॥
रंगमहल निर्दोष, वहँ झिलमिल नूर है ।
निरगुन सेज बिछाय, सभी करि दूर भै³ ॥ ७ ॥
मंदिर दीपक बारि, बिन बाती घीव की ।
सुघर चतुर गुन रासि, लाड़िली पीव को ॥ ८ ॥
कहैँ गुरू सुकदेव, यौँ बालम मोहिये ।
चरनदास ले सखी, जो प्रेम समोहिये ॥ ९ ॥
(१) बड़ी । (२) पति । (३) भय, डर ।
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