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सर्वकोश
संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 267 में से

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पृष्ठ 201

१६२ शब्द संग्रह
हरि ने मो सूं आप छिपायौ, गुरु दीपक दै ताहि दिखायौ॥७
फिर हरि बंध-मुक्ति१ गति लाये, गुरु ने सबही भर्म मिटाये८
चरनदास पर तन मन वारूँ, गुरु न तजूँ हरि कूँ तजि डारूँ॥९
॥ चितावनी ॥
(१)
पानी का सा बुलबुला, यह तन ऐसा होय ।
पीव मिलन की ठानिये, रहिये ना पड़ि सोय ॥
रहिये ना पड़ि सोइ, बहुरि नहिं मनुखा देही ।
आपन ही कूँ खोजु, मिलै तब राम सनेही ॥
हरि कूँ भूले जो फिरैं, सहजो जीवन छार ।
सुखिया जब ही होयगो, सुमिरैगो करतार ॥
(२)
चौरासी भुगती घनी, बहुत सही जम मार ।
भ्रमि फिरे तिहुँ लोक मैं, तहू न मानी हार ॥
तहू न मानी हार, मुक्ति की चाह न कीन्ही ।
हीरा दँही पाइ, मोल माटी के दीन्ही ॥
मूरख नर समुझै नहीं, समुझाया बहु बार ।
चरनदास कहैं सहजिया, सुमिरै ना करतार ॥
॥ प्रेम ॥
मुकट लटक अटकी मन माहीं ।
निरतत२ नटवर मदन मनोहर, कुंडल झलक पलक बिथुराई१
नाक बुलाक हलत मुक्ताहल, होठ मटक गति भौंह चलाई।
ठुमक ठुमक पग धरत धरनि पर, बाँह उठाय करत चतुराई२
झुनक झुनक नूपुर झनकारत, तताथेई थेई रीझ रिझाई।
चरनदास सहजो हिये अंतर, भवन करौ जित रहौ सदाई३
(१) ऐसी मुक्ति जिसमें झीनी माया का बंधन लगा रहता है। (२) नाचते हैं।