संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० शब्द संग्रह
(२)
गुरु दूती¹ बिन हे सखी, पीव न देखो जाय ।
भावै तुम जप तप करि देखौ, भावै तीरथ न्हाय ॥ १ ॥
पाँच सखी पच्चीस सहेली, अति चतुर अधिकाय ।
मोहिं अयानी जानि कै, मेरो बालम लियो लुकाय²॥२॥
बेद पुरान सबै जो ढूँढ़े, स्रुति सिमरित सब धाय ।
आन धर्म औ क्रिया कर्म मैं, दीन्हो मोहिं भरमाय ॥३॥
भटकत भटकत जनमै हारी, चरन सखी गहे आय ।
सुकदेव साहिब किरपा करिकै, दीन्हो अलख लखाय ॥४॥
देखत ही सब भ्रम भय भागे, सिर सूँ गई बलाय ।
चरनदास जब प्रीतम पायो, दरसन कियो अघाय ॥५॥
॥ अनहद शब्द ॥
(१)
अनहद सबद अपार दूर सूँ दूर है ।
चेतन निर्मल सुद्ध दैह भरपूर है ॥ १ ॥
निःअच्छर है ताहि और निःकर्म है ।
परमातम तेहि मानि वही परब्रह्म है ॥ २ ॥
या के कीन्हे ध्यान होत है ब्रह्म हीं ।
धारै तेज अपार जाहिँ सब भर्म हीं ॥ ३ ॥
या को छोड़ै नाहिं सदा रहै लीन हीं ।
यही जो अनहद सार जानि परबीन हीं ॥ ४ ॥
(२)
जब से अनहद घोर सुनी ।
इन्द्री थकित गलित मन हूवा, आसा सकल भुनी ॥१॥
घूमत नैन सिथिल भइ काया, अमल जु सुरत सनी ।
रोम रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी ॥२॥
(१) बिचौलिया । (२) छिपाय ।