संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ शब्द संग्रह
देहरी लौं तेरी नारि चलैगी, बड़ी पौरि लौं माई ।
मरघट लौं सब बीर भतीजे, हंस अकेलो जाई ॥३॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़े ही, पूत रहैं घर माहीं ।
जिन के काज पचे दिन राती, सो सँग चालत नाहीं ॥४॥
देव पितर तेरे काम न आवैं, जिन की सेवा लावै ।
चरनदास सुकदेव कहत ह, हरि बिन मुक्ति न पावै ॥५॥
(३)
अपना हरि बिन और न कोई ।
मातु पिता सुत बंधु कुटुँब सब, स्वारथ ही के होई ॥१॥
या काया कूँ भोग बहुत दै, मरद्दन करि करि धोई ।
सो भी छूटत नेक तनिक सी, संग न चाली खोई ॥२॥
घर की नारि बहुत ही प्यारी, तिन मैं नाहीं दोई१ ।
जीवत कहती साथ चलूँगी, डरपन लागी सोई ॥३॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्जल मति खोई।
आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्रान ले जोई ॥४॥
या जग में कोइ हितू न दीखै, मैं समझाऊँ तोई ।
चरनदास सुकदेव कहैं यौं, सुनि लीजै नर लोई ॥५॥
॥ बिरह ॥
(१)
सुधि बुधि सब गइ खोय री, मैं इश्क दिवानी ।
तलफत हूँ दिन रैन ज्यौँ, मछली बिन पानी ॥ १ ॥
बिन देखे मोहिँ कल न परत है, देखत आँख सिरानी२।
सुधि आये हिय मैं दव३ लागै, नैनन बरखत पानी ॥२॥
जैसे चकोर रटत चंदा को, जैसे पपिहा स्वाँती ।
ऐसे हम तलफत पिय दरसन, बिरह बिथा यहि भाँती ॥३॥
(१) एक जान दो क़ालिब । (२) सीतल हुई । (३) आग ।