संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
पृष्ठ 196, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुल्ले शाह
[ संक्षिप्त जीवन-चरित्र के लिये देखो संतबानी संग्रह भाग १ पृष्ठ १५१ ]
॥ चितावनी ॥
(१)
अब तो जाग मुसाफर प्यारे, रैन घटी लटके सब तारे ॥टेक
आवागौन सराइँ डेरे, साथ तयार मुसाफर तेरे ।
अजे१ न सुन दा कूच नगारे ॥ १ ॥
कर लै आज करन दी वेला२, बहुरि न होसी आवन तेरा।
साथ तेरा चल चल्लु पुकारे ॥ २ ॥
आपो अपने लाहे३ दौड़ी, क्या सरधन क्या निरधन बौरी।
लाहा नाम तू लेहु सँभारे ॥ ३ ॥
बुल्ले सहु४ दी पैरी परिये, गफलत छोड़ हीला५ कुछ करिये ।
मिरग जतन बिन खेत उजारे ॥ ४ ॥
(२)
माटी खुदी करैंदी यार ॥ टेक ॥
माटी जोड़ा माटी घोड़ा, माटी दा असवार ॥ १ ॥
माटी माटी नूँ मारन लागी, माटी दे हथियार ॥ २ ॥
जिस माटी पर बहुती माटी, तिस माटी हंकार ॥ ३ ॥
माटी बाग बगीचा माटी, माटी दी गुलजार ॥ ४ ॥
माटी माटी नूँ देखन आई, माटी दी बहार ॥ ५ ॥
हंस खेल फिर माटी होई, पैंदी६ पाँव पसार ॥ ६ ॥
बुल्ले शाह बुझारत७ बूझी, लाह सिरौँ भौँ मार८ ॥ ७ ॥
(१) अब भी । (२) समय, अवसर । (३) लाहा=लाभ । (४) ख़ाविन्द ।
(५) कोशिश, जतन। (६) पड़ जायगो । (७) बूझ। (८) सिर से बोझ [लाह] उतार
कर ज़मीन [भौँ] पर पटक दिया।